नई दिल्ली। अयोध्या में प्रभु श्री राम मंदिर के निर्माण के लिए गठित ‘श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट’ एक बार फिर विवादों में है। मंदिर के फंड में कथित तौर पर पैसे के गबन और वित्तीय अनियमितताओं के मामले में सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है। इस याचिका में मामले की निष्पक्ष, समयबद्ध और पेशेवर जांच सुनिश्चित करने के लिए तत्काल एफआईआर (FIR) दर्ज करने का निर्देश देने की मांग की गई है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि करोड़ों भक्तों के दान से जुड़े इस संवेदनशील मामले की पारदर्शिता बनाए रखना बेहद जरूरी है।
अनगिनत भक्तों और आम लोगों की आस्था को पहुंच रही ठेस: याचिका
सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका अधिवक्ता अजय कुमार राय और दिनेश कुमार यादव द्वारा दायर की गई है। याचिका में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि एक संस्था जो ट्रस्ट के तौर पर काम कर रही है, उसके द्वारा फंड का गलत तरीके से प्रबंधन करना उन अनगिनत भक्तों और आम लोगों की आस्था, भावनाओं और भरोसे को सीधे तौर पर कमजोर करता है, जिन्होंने भव्य राम मंदिर निर्माण के लिए अपनी गाढ़ी कमाई दान में दी है। देश और विदेश के श्रद्धालुओं की भावनाएं इस ऐतिहासिक मंदिर से गहराई से जुड़ी हुई हैं।
जटिल वित्तीय अपराधों की जांच के लिए पेशेवर एजेंसी का होना जरूरी
याचिका के अनुसार, श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट से जुड़े गायब हुए फंड, अकाउंटिंग में हेरफेर और दूसरी वित्तीय गड़बड़ियों के आरोपों की सच्चाई का पता लगाना बेहद जरूरी है। इसके लिए एक ऐसी स्वतंत्र और पेशेवर जांच एजेंसी की आवश्यकता है, जिसके पास विशेष जानकारी, आवश्यक संसाधन, तकनीकी क्षमताएं और जटिल वित्तीय अपराधों की जांच के लिए एक स्थापित संस्थागत ढांचा हो।
बिना एफआईआर के यूपी पुलिस की SIT जांच पर उठाए सवाल: याचिकाकर्ताओं ने उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गठित स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) की कार्यशैली पर भी कानूनी सवाल खड़े किए हैं। याचिका में कहा गया है कि यूपी सरकार की SIT ने बिना कोई नियमित एफआईआर (FIR) या आपराधिक मामला दर्ज किए ही अपनी जांच शुरू कर दी है। ऐसी स्थिति में, जांच के दौरान जुटाए गए सबूतों की कानूनी अहमियत और कोर्ट में उनकी स्वीकार्यता को भविष्य में चुनौती दी जा सकती है, जिससे पूरा मुकदमा कमजोर हो सकता है।
सबूतों के साथ छेड़छाड़ और डेटा गायब होने का सता रहा डर
अदालत के समक्ष यह चिंता भी जताई गई है कि इस पूरे मामले का विषय वित्तीय लेनदेन, अकाउंटिंग रिकॉर्ड, इलेक्ट्रॉनिक डेटाबेस, इन्वेंटरी और ऑडिट ट्रेल्स से जुड़ा हुआ है। जब तक शीर्ष अदालत की ओर से जल्द से जल्द सही सुरक्षा निर्देश जारी नहीं किए जाते, तब तक इन महत्वपूर्ण डिजिटल और कागजी सबूतों में बदलाव, नुकसान, छेड़छाड़ या इनके गायब होने का खतरा लगातार बना रहेगा।
केंद्र सरकार, यूपी सरकार और ट्रस्ट के लिए रेगुलेटरी सिस्टम बनाने की मांग
याचिका में मांग की गई है कि सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से सीबीआई (CBI) के नेतृत्व में एक बहुविषयक स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम का गठन किया जाए, जो ट्रस्ट के मामलों और प्रशासन से जुड़ी कथित वित्तीय गड़बड़ियों तथा अन्य “गैर-कानूनी कार्यों” की गहराई से जांच करे। इसके साथ ही, याचिका में केंद्र सरकार, उत्तर प्रदेश सरकार और खुद ट्रस्ट को ऐसे कड़े नियामक (Regulatory), पर्यवेक्षक और ऑडिट सिस्टम बनाने के निर्देश देने की मांग की गई है, जो जनता के हित की रक्षा करने और लाखों भक्तों का भरोसा बनाए रखने के लिए आवश्यक हों।

