हजारीबाग: हजारीबाग शहर को जाम मुक्त करने और सौंदर्यीकरण के नाम पर नगर निगम द्वारा चलाई जा रही ‘अतिक्रमण हटाओ’ मुहिम अब एक बड़े कानूनी और सामाजिक विवाद के चक्रव्यूह में फंस गई है। निगम प्रशासन द्वारा सड़कों के किनारे से फुटपाथ दुकानदारों को बलपूर्वक हटाने और उनकी दुकानों को ध्वस्त करने की हालिया कार्रवाई के खिलाफ चौतरफा आक्रोश फूट पड़ा है। गरीब फुटपाथ दुकानदार संघ के प्रांतीय सलाहकार और अखिल भारतीय मजदूर संगठन (झारखंड) के प्रदेश अध्यक्ष अधिवक्ता विवेक कुमार वाल्मीकि ने इस प्रशासनिक रवैये को न केवल अमानवीय बताया है, बल्कि इसे देश की संसद द्वारा पारित केंद्रीय कानून और खुद माननीय उच्च न्यायालय के पुराने दिशा-निर्देशों की खुली अवमानना करार दिया है। इस बड़ी विधिक चूक को लेकर अब संघ ने आर-पार की लड़ाई का मन बनाते हुए बहुत जल्द उच्च न्यायालय (High Court) का दरवाजा खटखटाने का फैसला किया है।
- “बिना 2 मिनट का समय दिए रोजी-रोटी छीनना, मानवाधिकारों पर क्रूर प्रहार”
- ⚖️ इनसाइड विधिक विश्लेषण: दुकानदारों के पक्ष में तीन सबसे मजबूत कानूनी आधार
- 1. ‘स्ट्रीट वेंडर्स अधिनियम 2014’ की धारा 3(3) का सीधा उल्लंघन
- 2. ‘व्हाइट पट्टी’ (सफेद रेखा) का प्रशासनिक छलावा
- 3. मौलिक और संवैधानिक अधिकारों का हनन
- “फूट डालो और राज करो” की नीति के खिलाफ एकजुटता की अपील
“बिना 2 मिनट का समय दिए रोजी-रोटी छीनना, मानवाधिकारों पर क्रूर प्रहार”
ग्राउंड जीरो पर दुकानदारों के दर्द और प्रशासनिक कार्रवाई की तीखी आलोचना करते हुए अधिवक्ता विवेक कुमार वाल्मीकि ने कहा कि शहर को व्यवस्थित करने का कोई भी विरोध नहीं कर रहा है, लेकिन व्यवस्था के नाम पर बर्बरता को स्वीकार नहीं किया जा सकता।
विवेक कुमार वाल्मीकि ने प्रशासन को सीधी चुनौती देते हुए कहा:
“माननीय उच्च न्यायालय ने कभी भी और किसी भी आदेश में यह नहीं कहा कि देश के वैधानिक कानूनों और अधिनियमों के प्रावधानों को पूरी तरह ताक पर रख दिया जाए। अदालत ने यह कभी नहीं कहा कि बिना किसी वैकल्पिक व्यवस्था या पुनर्वास के गरीबों को सड़क पर भूखा मरने के लिए छोड़ दिया जाए। हजारीबाग नगर निगम प्रशासन जनता और दुकानदारों के बीच आधा-अधूरा सच फैलाकर उन्हें मानसिक रूप से भ्रमित कर रहा है। बिना दो मिनट का समय दिए किसी की रोजी-रोटी को बुलडोजर से कुचल देना, सीधे तौर पर मानवाधिकारों और देश के नागरिकों को मिले आजीविका के अधिकार पर एक क्रूर प्रशासनिक प्रहार है।”
⚖️ इनसाइड विधिक विश्लेषण: दुकानदारों के पक्ष में तीन सबसे मजबूत कानूनी आधार
इस पूरे विवाद को केवल एक प्रशासनिक कार्रवाई के रूप में नहीं देखा जा सकता, बल्कि इसके पीछे एक बेहद मजबूत कानूनी ढांचा है जिसे नगर निगम ने नजरअंदाज किया है। अधिवक्ता वाल्मीकि ने इसके तीन मुख्य विधिक आधार प्रस्तुत किए हैं:
1. ‘स्ट्रीट वेंडर्स अधिनियम 2014’ की धारा 3(3) का सीधा उल्लंघन
भारत की संसद द्वारा वर्ष 2014 में पारित केंद्रीय कानून यह स्पष्ट और अनिवार्य रूप से कहता है कि किसी भी शहर के भीतर जब तक सभी फुटपाथ दुकानदारों का व्यापक और मुकम्मल सर्वे पूरा नहीं कर लिया जाता और उन्हें बकायदा ‘वेंडिंग सर्टिफिकेट’ (दुकानदारी का प्रमाण पत्र) आवंटित नहीं कर दिया जाता, तब तक किसी भी दुकानदार को उसके स्थान से उजाड़ा, हटाया या विस्थापित नहीं किया जा सकता। हजारीबाग नगर निगम इस बुनियादी और वैधानिक दायित्व को पूरा करने में अपनी स्थापना के बाद से अब तक पूर्णतः विफल साबित हुआ है।
2. ‘व्हाइट पट्टी’ (सफेद रेखा) का प्रशासनिक छलावा
नगर निगम द्वारा सड़कों के किनारे खींची जा रही सफेद पट्टी को लेकर संघ ने इसे कानूनी रूप से अवैध बताया है। देश के संबंधित वेंडिंग कानूनों में किसी भी प्रकार की तात्कालिक ‘सफेद पट्टी’ या कामचलाऊ रेखा की कोई व्यवस्था नहीं है। कानून में केवल और केवल ‘परमानेंट वेंडिंग जोन’ (स्थायी दुकानदार क्षेत्र) के निर्माण का अनिवार्य प्रावधान है। जब तक निगम प्रशासन शहर के भीतर विभिन्न चिन्हित स्थानों पर स्थायी रूप से वेंडिंग जोन का निर्माण नहीं करता, तब तक शहर को पूरी तरह से जाम मुक्त बनाना व्यावहारिक और कानूनी दोनों रूप से असंभव है।
3. मौलिक और संवैधानिक अधिकारों का हनन
यह पूरी बलपूर्वक कार्रवाई भारतीय संविधान के दो सबसे महत्वपूर्ण अनुच्छेदों पर सीधा कुठाराघात है। पहला, अनुच्छेद 21 जो देश के प्रत्येक नागरिक को ‘गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार’ देता है और दूसरा, अनुच्छेद 19(1)(g) जो भारत के किसी भी हिस्से में ईमानदारी से अपनी ‘रोजी-रोटी और व्यापार कमाने का मौलिक अधिकार’ प्रदान करता है। बिना नोटिस और पुनर्वास के किसी की आजीविका छीनना असंवैधानिक है।
“फूट डालो और राज करो” की नीति के खिलाफ एकजुटता की अपील
विवाद की इस गंभीर घड़ी में गरीब फुटपाथ दुकानदार संघ के केंद्रीय नेतृत्व ने हजारीबाग के तमाम छोटे दुकानदारों, खोमचे वालों और रेहड़ी-पटरी चलाने वालों से आपसी व्यक्तिगत मतभेदों, गुटबाजियों और पुरानी शिकायतों को पूरी तरह से भुलाकर ‘गरीब फुटपाथ दुकानदार संघ’ के एकल बैनर तले एकजुट होने का बड़ा आह्वान किया है।
संघ के पदाधिकारियों का मानना है कि प्रशासनिक अधिकारी इस आंदोलन को दबाने और कमजोर करने के लिए “फूट डालो और राज करो” की औपनिवेशिक नीति का सहारा ले रहे हैं। दुकानदारों को अलग-अलग समूहों में बांटकर उनके मनोबल को तोड़ने की कोशिश की जा रही है। ऐसे नाजुक वक्त में नेतृत्व का एक सुर में बोलना और सभी दुकानदारों का एक छत के नीचे खड़ा होना अनिवार्य है। यदि दुकानदार आंतरिक मतभेदों के कारण आपस में बंट गए, तो यह वैधानिक आंदोलन कमजोर हो जाएगा जिसका सीधा फायदा उन अधिकारियों को मिलेगा जो बिना वैकल्पिक व्यवस्था के इन्हें सड़कों से बेदखल करना चाहते हैं।
अधिवक्ता विवेक कुमार वाल्मीकि ने रिपोर्ट के अंत में पूरी दृढ़ता के साथ अपना विजन स्पष्ट करते हुए कहा कि संघ इस दमनकारी नीति के सामने कतई घुटने नहीं टेकेगा। संघ कानूनी मोर्चे पर माननीय उच्च न्यायालय के भीतर और जमीनी मोर्चे पर सड़कों पर, दोनों ही जगहों पर पूरी मुस्तैदी और संवैधानिक गरिमा के साथ लड़ाई लड़ेगा भी और अंततः गरीबों के हक की जीत को सुनिश्चित भी करेगा।


