मनीष कुमार मुन्ना
संध्या न्यूज ब्यूरो / हजारीबाग (समापन खंड)
1790 में कैप्टन बोडम के खींचे गए उस पहले सैन्य नक्शे से लेकर, 1782 के ‘न्यू मिलिट्री रोड’ और फिर 1884 में आधी रात को ‘रामगढ़ बटालियन’ के विदा होने तक… ‘द बोडम बाजार फाइल्स’ ने आपको हजारीबाग के उस अतीत से रूबरू कराया जो सदियों से छिपा हुआ था।
लेकिन इस खोजी सीरीज के आखिरी और चौथे भाग में, हम उस अंतिम और सबसे बड़े राज को खोलने जा रहे हैं, जिसने इस ब्रिटिश मिलिट्री बेस की ईंट से ईंट बजा दी और इसे गुलामी की छावनी से आज़ादी के महातीर्थ में बदल दिया।
द ट्विस्ट: जब फौजी बैरक बने ‘आजादी के पिंजरे’
सन 1884 में जब ब्रिटिश फौज हजारीबाग छावनी (Cantonment) खाली करके आगे बढ़ गई, तो उनके पीछे रह गया था एक बेहद मजबूत और चाक-चौबंद प्रशासनिक और सुरक्षा का ढांचा। अंग्रेज समझ रहे थे कि फौज के जाने के बाद यह इलाका उनके नियंत्रण में रहेगा। लेकिन इतिहास को कुछ और ही मंजूर था।
20वीं सदी की शुरुआत के साथ ही पूरे देश में आजादी का बिगुल फूंक दिया गया। अंग्रेजों ने जिस मजबूत सुरक्षा घेरे और जेल के ढांचे को अपनी रक्षा के लिए बनाया था, वही ढांचा उनके लिए सबसे बड़ी मुसीबत बन गया। कैप्टन बोडम का यह पुराना छावनी क्षेत्र अब भारत मां के वीर सपूतों और क्रांतिकारियों का मुख्य केंद्र बनने जा रहा था।
द एंट्री: ‘छोटा नागपुर केसरी’ और वो ऐतिहासिक ललकार
कहानी में सबसे बड़ा और गौरवशाली मोड़ तब आता है, जब इस कंटोनमेंट और बोडम बाजार के राजनीतिक गलियारों में गूंजती है हजारीबाग की माटी के लाल—बाबू रामनारायण सिंह की आवाज! महात्मा गांधी ने जिन्हें खुद ‘छोटा नागपुर केसरी’ की उपाधि दी थी।
बाबू रामनारायण सिंह और उनके साथियों ने इसी पुराने ब्रिटिश प्रशासनिक क्षेत्र को अपनी राष्ट्रभक्ति और आंदोलनों का गढ़ बना लिया। जिस झंडा चौक की सीमाओं को आज बोडम बाजार छूता है, वहां विदेशी कपड़ों की होलियां जलाई जाने लगीं और कैप्टन बोडम की बनाई सीधी सड़कों पर ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ इंकलाब के नारे गूंजने लगे। तराजू उठाने वाले स्थानीय व्यापारी अब आज़ादी के दीवानों के सबसे बड़े मददगार बन चुके थे।
द ग्रेट एस्केप: जब हजारीबाग ने बदल दिया देश का इतिहास
इस थ्रिलर का सबसे बड़ा क्लाइमेक्स साल 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के दौरान इसी छावनी क्षेत्र से सटे हजारीबाग सेंट्रल जेल (अब लोकनायक जयप्रकाश नारायण केंद्रीय कारा) में लिखा गया।
अंग्रेजों ने देश के बड़े नेताओं को कैद करने के लिए हजारीबाग के इसी सुरक्षित मिलिट्री बेल्ट को चुना था। उन्हें लगा था कि चारों तरफ से सुरक्षित इस कंटोनमेंट इलाके से परिंदा भी पर नहीं मार पाएगा। लेकिन दिवाली की वो रात इतिहास में अमर हो गई, जब लोकनायक जयप्रकाश नारायण (JP) अपने साथियों के साथ इस जेल की ऊंची दीवारों को फांदकर गायब हो गए! इस ‘ग्रेट एस्केप’ ने ब्रिटिश हुकूमत की खुफिया व्यवस्था और इस पुराने मिलिट्री बेस के गुरूर को धूल में मिला दिया।
द क्लाइमेक्स: एक नए युग का उदय
15 अगस्त 1947 को जब देश आजाद हुआ, तो कैप्टन बोडम के उस औपनिवेशिक नक्शे पर तिरंगा लहरा उठा। समय के साथ ‘मोजा कैंटोनमेंट’ की वो पुरानी कड़वी यादें पीछे छूटती गईं और इस पूरे इलाके ने आधुनिक हजारीबाग का रूप ले लिया।
आज सन 2026 में, बोडम बाजार, मटवारी और कोर्ट रोड का यह पूरा इलाका हजारीबाग नगर निगम का सबसे समृद्ध और धड़कता हुआ व्यावसायिक हिस्सा है। बंदूक की गोलियों की जगह अब यहाँ दुकानों के शटरों की आवाज गूंजती है, और फौजियों की परेड की जगह ग्राहकों की चहल-पहल रहती है।
समापन: विरासत आज भी जिंदा है…
कैप्टन बोडम की ग्रिड टाउन प्लानिंग से शुरू हुई यह दास्तान, स्कूलों-कॉलेजों के नीचे दबे सैन्य बैरकों, होली क्रॉस की ‘नाच बाड़ी’, 1782 के सीक्रेट हाईवे और आज़ादी के महासंग्राम से गुजरती हुई आज आपके सामने पूरी तरह बेपर्द हो चुकी है।
’द बोडम बाजार फाइल्स’ की यह खोजी सीरीज आज यहीं समाप्त होती है। लेकिन अगली बार जब आप बोडम बाजार की उन सीधी कतार वाली गलियों से गुजरें, तो याद रखिएगा कि आप सिर्फ एक बाजार में नहीं घूम रहे हैं… आप हजारीबाग के सवा दो सौ साल पुराने उस जीवंत इतिहास के पन्नों पर चल रहे हैं, जिसने इस शहर को ‘हजारीबाग’ बनाया है!
(समाप्त)
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