संध्या न्यूज ब्यूरो (हज़ारीबाग/चरही/बड़कागांव): Hazaribagh illegal coal mining: सिस्टम की नाक के नीचे जब रसूख और काले धन का गठजोड़ हावी हो जाए, तो कानून की बंदूकों की कड़क भी मूक बधिर हो जाती है। हज़ारीबाग ज़िले के चरही और बड़कागांव कोयला अंचलों से सामने आई एक ताजा वीडियो ने प्रशासनिक दावों और पुलिसिया गश्त की पोल खोल कर रख दी है। सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा यह वीडियो रोंगटे खड़े कर देने वाला है, जिसमें पत्थरों को काटकर बनाई गई एक संकरी, अंधेरी और बेहद खतरनाक गुफानुमा ‘मौत की सुरंग’ से अवैध कोयले से लदा एक ट्रैक्टर बाहर निकलने की जद्दोजहद करता दिख रहा है। चढ़ाई इतनी संकरी और ढलान इतनी खतरनाक है कि वजन के मारे ट्रैक्टर के आगे के दोनों पहिए हवा में लहरा जाते हैं। पल भर की भी चूक सीधे ड्राइवर को काल के गाल में सुलाने के लिए काफी है, लेकिन चंद रुपयों की खातिर मौत के इस कुएं में इंसानी जिंदगी को रोज धकेला जा रहा है। यह रोंगटे खड़े कर देने वाला ताजा नजारा हज़ारीबाग के चरही का है, जिसने ज़िले में एक बार फिर माफियाओं द्वारा बेधड़क चलाए जा रहे दो नंबर कोयले के काले खेल को बेनकाब कर दिया है।
खूनी इतिहास गवाह है: पहले भी खदानों में हुई हैं मौतें, खेतों में हुआ गुप्त अंतिम संस्कार
Hazaribagh illegal coal mining: चरही, बरकागांव और आस-पास के कोयला अंचलों में आज जो ट्रैक्टरों के जरिए जान जोखिम में डालकर धड़ल्ले से कोयला निकाला जा रहा है, इसका इतिहास बेहद खूनी और खौफनाक रहा है। यह पहली बार नहीं है जब इस तरह नियमों को ताक पर रखकर मौत के कुएं से कोयला निकाला जा रहा हो। अभी कुछ समय पहले भी इसी इलाके में कोयला लदा एक अवैध ट्रैक्टर पलटने से एक युवक की दर्दनाक मौत हो चुकी है। उससे ठीक पहले, बड़कागांव और चरही के गुफानुमा अवैध मुहानों पर ‘चाल धंसने’ से दो गरीब मजदूरों की मलबे में दबकर जान चली गई थी।
हैरान करने वाली बात यह है कि पूर्व में हुए इन हादसों का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड पुलिस के पास दर्ज नहीं हो सका। क्योंकि यहाँ माफिया का एक खौफनाक ‘डेथ प्रोटोकॉल’ काम करता है, जिसके तहत हादसे के फौरन बाद क्षत-विक्षत शवों को पुलिस और मीडिया की नजरों से छिपाकर, बिना पोस्टमार्टम कराए, रात के अंधेरे में छुप-छुपाकर अंतिम संस्कार कर दिया जाता है। पूर्व में घायल हुए एक अन्य मजदूर का भी किसी सुदूर और गोपनीय निजी क्लिनिक में गुपचुप तरीके से इलाज कराया गया था, ताकि पुलिस केस न बन सके। आज जो वीडियो सामने आया है, वह साफ गवाही दे रहा है कि पिछली खौफनाक मौतों और हादसों से सबक लेने के बजाय माफिया आज भी उसी ढर्रे पर बेखौफ होकर इस खूनी खेल को जारी रखे हुए हैं।
सबसे बड़ा सुलगता सवाल: पत्रकारों और जनता को पता, फिर पुलिस को ‘भनक’ क्यों नहीं?
Hazaribagh illegal coal mining: इस काले कारोबार का सबसे वीभत्स और कड़वा पहलू वो सवाल है जो आज हज़ारीबाग का हर आम नागरिक व्यवस्था के मुंह पर दाग रहा है। जब इस अवैध उत्खनन और खतरनाक परिवहन के लाइव वीडियो आज आम जनता के मोबाइल तक पहुंच जाते हैं, जब स्थानीय पत्रकारों को सटीक रूप से पता होता है कि किस वक्त, किस रास्ते से और किस जंगल से ‘मौत की सुरंग’ चल रही है, तो फिर आधुनिक संचार साधनों और खुफिया तंत्र से लैस ज़िला पुलिस प्रशासन को इसकी भनक क्यों नहीं लगती?
स्थानीय लोगों का सीधा आरोप है कि यह ‘भनक न लगने’ का नाटक दरअसल एक सोची-समझी ‘मौन सहमति’ है। चरही से लेकर बरकागांव तक, अवैध कोयला ले जाने वाले ट्रैक्टरों और ट्रकों की बकायदा मोटी ‘एंट्री फीस’ बंधी होती है। जब तक सिस्टम की जेब में काले हीरे की चमक पहुंच रही है, तब तक कानून की आंखें अंधी, कान बहरे और ज़ुबान गूंगी ही रहती हैं। यही कारण है कि पूर्व में ट्रैक्टर पलटने या चाल धंसने जैसी बड़ी घटनाएं होने के बावजूद, आज फिर से उसी बेखौफ अंदाज में ट्रैक्टरों को मौत के मुहाने पर उतारा जा रहा है।
कब थमेगा ‘लालची खेल’ और ‘लाशों की तस्करी’?
Hazaribagh illegal coal mining: हज़ारीबाग में पत्रकारों और आम जनता के कैमरों में कैद होती आज की ये ताजा तस्वीरें इस बात का जिंदा प्रमाण हैं कि यहाँ इंसानी जान की कीमत कोयले की एक बोरी से भी कम हो चुकी है। जब तक टास्क फोर्स, वन विभाग और स्थानीय पुलिस के बड़े अधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं होगी, और जब तक इन अवैध सुरंगे और माइनिंग पैचों को बारूद से पूरी तरह उड़ाकर हमेशा के लिए बंद नहीं किया जाएगा, तब तक माफिया पुरानी मौतों के सच को दबाकर आज की तरह ही गरीब मजदूरों की बलि चढ़ाते रहेंगे और अपनी तिजोरियां भरते रहेंगे।


