संध्या न्यूज़ ब्यूरो, हजारीबाग: एक पुराना शेर है—“परिंदों को मिलेगी मंज़िल एक दिन, ये फैले हुए उनके पर बोलते हैं। वो लोग रहते हैं खामोश अक्सर, ज़माने में जिनके हुनर बोलते हैं।” लेकिन जब बात किसी बेसहारा, अनाथ या लावारिस इंसान की हो, तो वहां हुनर नहीं, समाज की सामूहिक संवेदना और कुछ कर गुजरने का जज्बा बोलता है। कुछ ऐसा ही जज्बा इन दिनों हजारीबाग के सामाजिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। शहर की जानी-मानी सामाजिक संस्था ‘हेल्पिंग इंडिया ट्रस्ट’ ने एक बार फिर जिला प्रशासन और शेख भिखारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल (SBMCCH) प्रबंधन के सामने एक ऐसी मांग दोहराई है, जो सीधे तौर पर इंसानियत और व्यवस्था के बीच के पुल को मजबूत करती है। ट्रस्ट ने अस्पताल परिसर में अनाथ, लावारिस और असहाय मरीजों के लिए एक विशेष समर्पित वार्ड (Dedicated Special Ward) स्थापित करने की मुहिम तेज कर दी है।
इस मुहिम के पीछे सिर्फ एक मांग नहीं है, बल्कि इसके पीछे छुपी है एक बेसहारा वृद्ध की वो मार्मिक कहानी, जिसने हजारीबाग के सजग नागरिकों को झकझोर कर रख दिया और यह साबित किया कि अगर इंसान ठान ले, तो मरती हुई उम्मीदों को भी नया जीवन दिया जा सकता है।
उपेक्षा के अंधेरे से सम्मान के उजाले तक: एक अज्ञात वृद्ध की कहानी
कुछ समय पहले की बात है, जब शेख भिखारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल के एक कोने में एक अज्ञात, अत्यंत बीमार और बेसहारा वृद्ध पड़े हुए थे। उनके आगे-पीछे न तो कोई रोने वाला था और न ही कोई दवा-पानी पूछने वाला। वह सिर्फ एक मरीज नहीं थे, बल्कि वह व्यवस्था की उदासीनता और समाज की बेरुखी का एक जीवित दस्तावेज बन चुके थे। जब उनके बचने की उम्मीदें लगातार दम तोड़ रही थीं, तब हेल्पिंग इंडिया ट्रस्ट के युवाओं की नजर उन पर पड़ी।
संस्था ने केवल उनकी सुध ही नहीं ली, बल्कि अस्पताल प्रबंधन से लगातार पैरवी कर उनके लिए बेहतर इलाज की व्यवस्था सुनिश्चित कराई। ट्रस्ट के सदस्य बताते हैं कि आज स्थिति बिल्कुल उलट है। कभी उपेक्षा का शिकार रहे वही अज्ञात वृद्ध अब पहले से काफी बेहतर स्थिति में हैं। उन्हें नियमित रूप से उचित उपचार, समय पर दवाइयां, पौष्टिक खान-पान और सबसे बढ़कर एक सुरक्षित संरक्षण मिल रहा है।
संस्था के कार्यकर्ता आज भी नियमित अंतरालों पर अस्पताल जाते हैं, उस वृद्ध के पास बैठते हैं, उनका हाथ थामते हैं और उनके स्वास्थ्य का हालचाल लेते हैं। जब वह वृद्ध अपनी धुंधली आंखों से मुस्कुराकर देखते हैं, तो ऐसा महसूस होता है कि सामूहिक प्रयास और एक छोटी सी कोशिश किसी की बुझती हुई जिंदगी में फिर से उम्मीद का कितना बड़ा दीया जला सकती है। ट्रस्ट के पदाधिकारियों का कहना है कि यह किसी एक व्यक्ति की व्यक्तिगत मदद का साधारण मामला नहीं है, बल्कि यह एक संवेदनशील समाज और मानवीय सोच की सामूहिक जीत है।
जब सामान्य वार्डों में घुटता है लावारिसों का दम: विशेष वार्ड की क्यों है जरूरत?
हेल्पिंग इंडिया ट्रस्ट की यह मुहिम इस एक सफलता पर आकर रुक नहीं जाती। संस्था का मानना है कि अस्पताल में इस वृद्ध जैसे न जाने कितने ही लावारिस और अनाथ मरीज हर दिन आते हैं। वर्तमान में अस्पताल के भीतर ऐसे मरीजों के लिए कोई अलग या समर्पित वार्ड नहीं है। इसका नतीजा यह होता है कि इन बेसहारा मरीजों को सामान्य वार्डों में अन्य मरीजों के साथ रख दिया जाता है।
एक सामान्य मरीज के साथ उसका पूरा परिवार, रिश्तेदार और तीमारदार होते हैं जो पल-पल की जरूरत का ख्याल रखते हैं। लेकिन इन लावारिस मरीजों का इस दुनिया में कोई नहीं होता। नर्स या डॉक्टर दवा लिखकर चले जाते हैं, लेकिन समय पर दवा खिलाना, उन्हें करवट दिलाना, साफ-सफाई का ध्यान रखना या उनके सीधे मुंह में पानी डालना—इन सब बुनियादी चीजों के लिए वे तरस जाते हैं। कई बार तो वे भूख और अकेलेपन के कारण ही दम तोड़ देते हैं।
इसी पीड़ा को गहराई से महसूस करते हुए हेल्पिंग इंडिया ट्रस्ट ने शेख भिखारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल प्रबंधन और हजारीबाग के जिला प्रशासन से पुरजोर शब्दों में मांग की है कि अस्पताल के भीतर एक ‘विशेष बेसहारा वार्ड’ बनाया जाए। इस वार्ड में न केवल मुफ्त और त्वरित इलाज की सुविधा हो, बल्कि वहां ऐसे संवेदनशील पैरामेडिकल स्टाफ या वॉलंटियर्स की प्रतिनियुक्ति हो, जो इन मरीजों की देखभाल एक परिवार की तरह कर सकें। यह वार्ड इन असहाय लोगों को एक छत के नीचे सम्मानजनक इलाज, सुरक्षा और आवश्यक मानवीय वात्सल्य प्रदान करेगा।
एक संवेदनशील समाज की पहचान: ट्रस्ट ने की आम जनता से अपील
संस्था ने इस पूरी मुहिम को एक जन-आंदोलन का रूप देने के लिए हजारीबाग की आम जनता, प्रबुद्ध नागरिकों और युवाओं से भी आगे आने की भावुक अपील की है। ट्रस्ट के सदस्यों का कहना है कि सरकारें और प्रशासन अपनी जगह काम करते हैं, लेकिन एक संवेदनशील समाज की असली पहचान इसी बात से होती है कि वह अपने सबसे कमजोर और लावारिस हिस्से के साथ कैसा बर्ताव करता है।
हर उस व्यक्ति को, जिसका इस दुनिया में कोई नहीं है, उसे कम से कम बीमारी के वक्त सम्मान, बेहतर उपचार और थोड़ा सा अपनापन मिलना ही चाहिए। यही सच्ची मानवता है और यही एक जागरूक शहर की पहचान भी है। अब देखना यह है कि हेल्पिंग इंडिया ट्रस्ट के इस बेहद सराहनीय और नेक प्रयास पर हजारीबाग जिला प्रशासन और अस्पताल प्रबंधन कितनी जल्दी संज्ञान लेता है और कब इस विशेष वार्ड की आधारशिला रखी जाती है।


