संध्या न्यूज ब्यूरो / हजारीबाग: Hazaribagh Coal Smuggling: झारखंड के रामगढ़ और हजारीबाग जिलों की सीमाएं जहां आपस में मिलती हैं, वहां सिर्फ दो जिलों का भूगोल नहीं मिलता, बल्कि अवैध कोयला तस्करी का एक ऐसा अभेद्य गलियारा मिलता है जिसके किस्से हर जुबान पर हैं। रामगढ़ के रजरप्पा क्षेत्र में भेड़ा नदी के पास स्थित लेढी टुंगरी की ओर बढ़ने पर करीब 25 से 35 साल पुरानी भयानक सुरंगे साफ दिखाई देती हैं, जो चीख-चीखकर कहती हैं कि इस इलाके की कोख को किस कदर बेरहमी से खोखला किया गया है।
पिछले साल इन्हीं सुरंगों के एक मुहाने (एक्सटेंशन) में लगी भीषण आग ने पूरे प्रशासनिक अमले को हिला कर रख दिया था। लेकिन आग सिर्फ जमीन के नीचे नहीं लगी है, बल्कि अवैध कमाई की वो आग पूरे रामगढ़ और हजारीबाग के कुज्जू, चरही, तापीन और बड़कागांव जैसे इलाकों में धधक रही है, जहां दो नंबर के कोयले का खेल डंके की चोट पर खेला जा रहा है।
दिन में सन्नाटा, रात होते ही ट्रैक्टरों और ट्रकों की गड़गड़ाहट
Hazaribagh Coal Smuggling: इस पूरे खेल का एक तयशुदा टाइम-टेबल है। जब सूरज ढल जाता है और आम लोग अपने घरों में दुबक जाते हैं, तब चरही और सीसीएल के तापीन साउथ डंप यार्ड के आस-पास के जंगलों और रेलवे साइडिंग से तस्करों की फौज सक्रिय हो जाती है। सैकड़ों मजदूर अपनी जान जोखिम में डालकर इन अवैध मुहानों और डंप यार्ड से कोयला टपाते हैं।
इसके बाद शुरू होता है असली खेल। रात के घने अंधेरे में हेडलाइट बंद किए दर्जनों ट्रैक्टर और छोटे ट्रक अवैध कोयले की खेप लेकर हजारीबाग और रामगढ़ के औद्योगिक क्षेत्रों की तरफ दौड़ने लगते हैं। डेमोटैंड स्थित कई अवैध भट्ठियों, और कुण्डिलबागी स्थित फैक्ट्रियों में यह अवैध कोयला खपाया जाता है। कागजों पर इन फैक्ट्रियों में वैध कोयले की खपत दिखाई जाती है, लेकिन असलियत यह है कि रात के अंधेरे में पहुंचने वाले ये ट्रैक्टर ही इन फैक्ट्रियों की मुख्य खुराक हैं।
‘चार P’ का वो कथित स्टील फ्रेम, जिसमें घुटती है जांबाज पत्रकारों की सांस
Hazaribagh Coal Smuggling: हजारीबाग और रामगढ़ के कुज्जू, चरही और बड़कागांव इलाके में बच्चा-बच्चा जानता है कि किस रास्ते से ट्रैक्टर गुजरते हैं और किस फैक्ट्री के गेट रात में अवैध कोयले के लिए खुलते हैं। लेकिन इस पूरे तंत्र को सुरक्षा देने के लिए ‘चार P’— पुलिस, प्रशासन, पॉलिटिक्स (राजनीति) और प्रेस (पत्रकारिता) का एक ऐसा सिंडिकेट काम करता है, जिसे भेद पाना नामुमकिन सा लगता है। इस काले धंधे से हर रात जो करोड़ों का मुनाफा कमाया जाता है, वह इस कथित सिंडिकेट में सबकी हैसियत के अनुसार बंटता है। पुलिस और प्रशासन इस अवैध कारोबार के ‘स्टील फ्रेम’ हैं, जो कार्रवाई की फाइलों को दबाए रखते हैं। इस पूरे सिंडिकेट में सबसे बड़ी हैसियत राजनीति (पॉलिटिक्स) की है, जो रसूखदारों को संरक्षण देती है।
वहीं सबसे लाचार हैसियत इस तंत्र में ‘प्रेस’ यानी पत्रकार की होती है। अधिकांश स्थानीय पत्रकार या तो माफियाओं के खौफ से अपनी आंखें मूंद लेते हैं या फिर शांत बैठ जाते हैं। लेकिन इस खौफ के बीच भी कुछ ऐसे जांबाज पत्रकार हैं, जो अपनी जान हथेली पर लेकर इन सुरंगों और फैक्ट्रियों के गेट पर कैमरे का फ्लैश चमकाते हैं। वे जानते हैं कि वे सीधे तौर पर मौत और खतरों से खेल रहे हैं। ये सुरंगे और डेमोटांड और कुण्डिलबागी की फैक्ट्रियों की चिमनियों से निकलता धुआं गवाह है कि सिस्टम की जमीन कितनी खोखली हो चुकी है।


