हजारीबाग। राजनीति में सबसे कठिन दौर वह होता है, जब जनता की उम्मीदें आसमान पर हों और व्यवस्था के पास उन्हें पूरा करने के लिए पर्याप्त संसाधन या इच्छाशक्ति नजर न आए। हजारीबाग की मौजूदा तस्वीर कुछ ऐसी ही दिखाई दे रही है। सड़क से लेकर रोजगार तक और बुनियादी सुविधाओं से लेकर बड़ी विकास योजनाओं तक, हर मोर्चे पर सवाल हैं। इन सवालों का सीधा सामना स्थानीय सांसद और विधायकों को करना पड़ रहा है।
हजारीबाग के सांसद भाजपा से हैं, जबकि राज्य में सत्ता का नेतृत्व झारखंड मुक्ति मोर्चा और कांग्रेस कर रही है। केंद्र और राज्य की अलग-अलग राजनीतिक धुरी का असर स्थानीय राजनीति पर भी पड़ना स्वाभाविक है। योजनाओं के लिए केंद्र और राज्य के बीच समन्वय जितना जरूरी है, उतना ही महत्वपूर्ण स्थानीय प्रशासन की सक्रियता भी है। लेकिन आम जनता के लिए इन प्रक्रियाओं की कोई अहमियत नहीं। उसे सिर्फ परिणाम चाहिए।
यही वजह है कि जब सड़क टूटती है, नाली जाम होती है, पानी की समस्या बढ़ती है या कोई योजना वर्षों तक अधूरी रहती है तो सवाल सांसद और विधायक से पूछा जाता है।
सांसद के सामने अलग चुनौती
लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले सांसद के पास विकास के लिए अपने स्तर पर कई माध्यम जरूर हैं, लेकिन हर योजना उनके सीधे नियंत्रण में नहीं होती। केंद्रीय योजनाओं, राज्य सरकार के विभागों और स्थानीय प्रशासन के बीच तालमेल के बिना बड़े बदलाव संभव नहीं हैं।
ऐसे में सांसद के लिए जनता के बीच सक्रिय रहना और उपलब्ध संसाधनों से छोटे-बड़े कार्य कराने का प्रयास करना राजनीतिक रूप से जरूरी हो जाता है। लेकिन इससे मूल सवाल खत्म नहीं होते। जनता अब यह जानना चाहती है कि बड़े वादों का वास्तविक परिणाम कब दिखाई देगा।
विधायक भी दबाव में
विधानसभा क्षेत्र की समस्याओं को लेकर विधायकों पर भी लगातार दबाव बढ़ रहा है। राज्य की वित्तीय स्थिति, योजनाओं के लिए राशि की उपलब्धता और विभागीय स्तर पर निर्णयों की धीमी गति का असर विकास कार्यों पर पड़ने की शिकायतें सामने आती हैं।
हजारीबाग शहर की सड़कों की स्थिति इसका एक उदाहरण है। ग्रामीण इलाकों में भी सड़क, पानी, बिजली और दूसरी सुविधाओं को लेकर लोगों की नाराजगी सामने आती रहती है। जब स्थानीय स्तर पर काम नहीं होता तो जनता के पास अपने विधायक या सांसद के कार्यालय और दरवाजे तक पहुंचने के अलावा विकल्प भी क्या बचता है?
सरकार पर आरोपों ने बढ़ाई मुश्किल
झारखंड सरकार पर विपक्ष लगातार अवैध खनन, भ्रष्टाचार, ट्रांसफर-पोस्टिंग और नियुक्तियों से जुड़े गंभीर आरोप लगा रहा है। इन आरोपों की सच्चाई का निर्धारण जांच एजेंसियों और न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से होना चाहिए, लेकिन राजनीतिक स्तर पर इन मुद्दों ने सरकार की मुश्किल जरूर बढ़ाई है।
इसी बीच रोजगार और नियुक्तियों को लेकर युवाओं की बेचैनी भी लगातार बढ़ रही है। युवाओं के आंदोलन सरकार के लिए चेतावनी हैं कि केवल योजनाओं की घोषणा से बात नहीं बनेगी, उन्हें जमीन पर परिणाम भी दिखाने होंगे।
आखिर जिम्मेदारी किसकी?
असल समस्या यही है कि केंद्र और राज्य के बीच राजनीतिक खींचतान हो, विभागों में फंड की कमी हो या प्रशासनिक स्तर पर देरी—इन सबका अंतिम असर आम नागरिक पर पड़ता है।
जनता को यह जानने में दिलचस्पी नहीं कि पैसा केंद्र से आना था या राज्य से। उसे यह जानना है कि उसके मोहल्ले की सड़क कब बनेगी, पानी की समस्या कब दूर होगी और उसके बच्चे को रोजगार कब मिलेगा।
इसलिए अब वक्त सिर्फ बयान जारी करने का नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने का है। सांसद को केंद्र के स्तर पर अपनी भूमिका निभानी होगी, विधायकों को राज्य सरकार और विभागों पर दबाव बनाना होगा और सरकार को यह साबित करना होगा कि राजनीतिक समीकरणों से ऊपर विकास की प्राथमिकता है।
वरना जनता के बीच एक ही सवाल घूमता रहेगा—
“समस्या हमारी है, सत्ता आपकी है… तो समाधान आखिर कौन करेगा?”


