रांची: झारखंड में आतंकवाद, स्लीपर सेल और संगठित आपराधिक गिरोहों के खिलाफ मोर्चा संभालने वाली आतंकवाद निरोधी दस्ता (ATS) को लेकर एक बेहद बड़ा प्रशासनिक और रणनीतिक बदलाव किया गया है। राज्य की एटीएस अब स्वतंत्र रूप से नहीं, बल्कि पूरी तरह झारखंड अपराध अनुसंधान विभाग (CID) के अधीन होकर काम करेगी। झारखंड की पुलिस महानिदेशक (DGP) तदाशा मिश्रा ने इस संबंध में एक आधिकारिक और कड़ा आदेश जारी कर दिया है। इस नए आदेश के लागू होते ही एटीएस को लेकर पूर्व में जारी किए गए सभी पुराने निर्देशों को तत्काल प्रभाव से विलोपित (निरस्त) कर दिया गया है।
डीजीपी के इस फैसले के बाद अब राज्य में आतंकवाद और संगठित अपराध के खिलाफ होने वाली जांच और अभियानों की रूपरेखा पूरी तरह बदलने वाली है।
2015 में हुआ था गठन, बाद में जुड़ा संगठित अपराध
डीजीपी द्वारा जारी आधिकारिक पत्र में इस विंग के इतिहास और इसके कार्यक्षेत्र का भी उल्लेख किया गया है। आदेश के अनुसार, झारखंड में पनप रहे आतंकवाद और देश विरोधी ताकतों पर प्रभावी ढंग से नकेल कसने के लिए साल 2015 में आतंकवाद विरोधी दस्ता (ATS) का गठन किया गया था। इसके तहत गृह, कारा एवं आपदा प्रबंधन विभाग की अधिसूचना के जरिए एटीएस के राज्य स्तरीय विशेष थाने को भी अधिसूचित किया गया था।
इसके बाद, साल 2021 में अधिसूचना संख्या 102/2021 के माध्यम से एटीएस के दायरे को और बढ़ाया गया। इसमें संगठित अपराध की रोकथाम के लिए एक विशेष विंग के गठन को मंजूरी दी गई। इसके तहत एटीएस को पूरे राज्य में सक्रिय गैंगस्टरों और संगठित अपराधियों के खिलाफ विधि सम्मत कड़ी कार्रवाई करने के लिए अधिकृत किया गया था। लेकिन अब नए आदेश के तहत इन सभी कांडों के अनुसंधान (Investigation) के लिए झारखंड एटीएस पूरी तरह सीआईडी के अधीन आ गई है।
क्या हैं डीजीपी के नए निर्देश? जानिए एटीएस का नया स्ट्रक्चर
डीजीपी के नए आदेश के बाद अब एटीएस की कार्यप्रणाली में प्रशासनिक और परिचालन के स्तर पर बड़े बदलाव देखने को मिलेंगे:
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सीआईडी का रहेगा पूर्ण नियंत्रण: अब से आतंक निरोधी दस्ता (ATS) के सभी प्रशासनिक कार्य, अनुसंधान, जांच, फील्ड ऑपरेशन और विभिन्न विभागों के साथ समन्वय (Coordination) पूरी तरह से सीआईडी के दिशा-निर्देशन और नियंत्रण में ही संचालित होंगे।
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ऑपरेशन और अभियान का जिम्मा: निर्देश में स्पष्ट किया गया है कि एटीएस का मूल काम आतंकवादियों से जुड़े नेटवर्क को ध्वस्त करना, स्लीपर सेल का उद्भेदन करना, देश विरोधी गतिविधियों पर रोक लगाना और किसी भी संभावित आतंकी हमले को नाकाम करना है। इसलिए, आतंकवाद विरोधी अभियानों और बचाव कार्यों के लिए पुलिस अधीक्षक (SP) एटीएस, पुलिस महानिरीक्षक (IG) अभियान के मार्गदर्शन में काम करना जारी रखेंगे।
जांच और मुकदमों की कमान अब सीआईडी प्रमुख के पास
अब तक एटीएस अपने स्तर पर मामलों की जांच और प्रभार तय करती थी, लेकिन अब जांच से जुड़ी पूरी प्रक्रिया सीआईडी की स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) के तहत चलेगी।
आदेश के मुताबिक, एटीएस के अंतर्गत आने वाले सभी कांडों का प्रभार ग्रहण करने का आदेश देना, केस के अनुसंधानकर्ता (IO) और पर्यवेक्षणकर्ता (Supervising Officer) को निर्धारित करना, सुपरविजन नोट (पर्यवेक्षण टिप्पणियां) जारी करना और प्रोग्रेस रिपोर्ट (प्रगति प्रतिवेदन) तैयार करना जैसे तमाम कार्य अब अपराध अनुसंधान विभाग (CID) की तय प्रक्रिया के अनुसार ही होंगे। ये सारे फैसले सीआईडी प्रमुख की देखरेख और सहमति से कराए जाएंगे।
‘गोपनीयता’ बनाए रखने का सख्त अल्टीमेटम
चूंकि एटीएस देश की सुरक्षा और राज्य के अति-संवेदनशील मामलों पर काम करती है, इसलिए डीजीपी के आदेश में सुरक्षा और गोपनीयता को लेकर विशेष हिदायत दी गई है। झारखंड एटीएस को यह कड़ा निर्देश दिया गया है कि वह अपने ऑपरेशन्स, इनपुट्स और केस डायरी से जुड़े सभी कार्यों के प्रति उच्च श्रेणी की गोपनीयता (High-Level Confidentiality) हर हाल में बरकरार रखे। सूचनाओं के लीक होने या किसी भी स्तर पर लापरवाही को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
झारखंड पुलिस मुख्यालय का यह कदम राज्य में कानून व्यवस्था को सुदृढ़ करने और जांच एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल बिठाने की दिशा में एक बड़ा मील का पत्थर माना जा रहा है।

