संध्या न्यूज ब्यूरो / हजारीबाग: एक तरफ पूरा देश भीषण गर्मी और ग्लोबल वार्मिंग से तप रहा है, बूंद-बूंद पानी और ऑक्सीजन के लिए त्राहि-त्राहि मची है, वहीं दूसरी तरफ हजारीबाग के कटकमसांडी से एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने पर्यावरण प्रेमियों के कलेजे को झकझोर कर रख दिया है। कटकमसांडी स्थित राजकीयकृत प्लस टू हाई स्कूल परिसर में सालों से शान से खड़े और स्कूल के बच्चों को अपनी ठंडी छांव में पालने वाले 21 विशाल यूकेलिप्टस (सफेदा) के पेड़ों पर मौत का साया मंडरा रहा है। विकास की अंधी दौड़ और प्रशासनिक फाइलों के बीच इन 21 ‘हरे संतों’ को जड़ से काटने की पूरी पटकथा लिखी जा चुकी है, जिसके बाद पूरे इलाके का पारा चढ़ गया है।
फाइलों में दफन हुई संवेदना: जब रक्षकों के ही ‘डेथ वारंट’ पर चल गई कलम
इस पूरे मामले का सबसे सनसनीखेज और दर्दनाक पहलू यह है कि जिन पेड़ों ने अंचल की आबोहवा को संभाला, उनके कत्ल की पूरी प्रशासनिक तैयारी हो चुकी है। पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का मान बढ़ाने वाले डॉ. अमरनाथ पाठक ने इस क्रूर फैसले पर एक बेहद भावुक और तीखा हमला बोला है।
डॉ. पाठक ने बेहद भारी मन से खुलासा किया कि स्कूल परिसर के इन 21 पेड़ों को काटकर लकड़ियों के ढेर में तब्दील करने के लिए प्रशासनिक स्वीकृति मिल चुकी है। जिम्मेदार अधिकारियों ने बकायदा फाइलों पर इसके ‘डेथ वारंट’ पर अपने दस्तखत भी कर दिए हैं। डॉ. पाठक ने तंज कसते हुए कहा कि सरकारी कागजों पर मुहर लगते ही ये लहलहाते पेड़ अब इस धरती पर “बस कुछ ही पलों के मेहमान” बनकर रह गए हैं। इन्हें टुकड़ों-टुकड़ों में काटकर बाजार में बेचने की अंदरूनी तैयारी पूरी है।
यूकेलिप्टस पर ‘पानी सोखने’ का ठप्पा, पर सांसों का क्या?
पेड़ों की कटाई के पीछे अक्सर यह दलील दी जाती है कि यूकेलिप्टस जमीन का पानी ज्यादा सोखता है। लेकिन पर्यावरणविदों ने इस तर्क की धज्जियां उड़ाते हुए कहा है कि जिन पेड़ों ने सालों से कंक्रीट के इस दौर में स्कूल परिसर को ऑक्सीजन का बैंक बनाकर रखा, धूल और प्रदूषण को अपने सीने पर झेला, उन्हें अचानक इस तरह अपराधी बनाकर काट देना कहाँ का न्याय है? क्या इन पेड़ों को काटने से पहले प्रशासन ने कोई व्यापक पर्यावरणीय आकलन (Environmental Assessment) किया? या फिर सिर्फ ठेकेदारी और लकड़ी के मुनाफे के चक्कर में इस हरी-भरी विरासत को उजाड़ा जा रहा है?

यादों की कुल्हाड़ी: बच्चों की छांव और गुरुओं की यादों का कत्लेआम
यह लड़ाई सिर्फ लकड़ी के लट्ठों की नहीं है, बल्कि कटकमसांडी के इस स्कूल की आत्मा की है। सालों से स्कूल आने वाले गरीब और ग्रामीण बच्चों के लिए ये पेड़ सिर्फ सफेदा के वृक्ष नहीं, बल्कि उनके सुख-दुख के साथी रहे हैं। आधी छुट्टी (लंच) में इन्हीं पेड़ों की छांव में बच्चों की किलकारियां गूंजती थीं, शिक्षक इसी हरियाली के साए में बैठकर देश का भविष्य गढ़ने की रणनीतियां बनाते थे। स्थानीय लोगों की भावनाएं इस कदर जुड़ी हैं कि आज जब इन पेड़ों पर आरी चलने की सुगबुगाहट तेज हुई है, तो हर आंख नम है और लोग गुस्से से उबल रहे हैं।
विकास के नाम पर विनाश कब तक? जनता मांग रही है जवाब!
कटकमसांडी की जागरूक जनता और पर्यावरण सेना अब आर-पार के मूड में है। लोगों का साफ कहना है कि अगर किसी तथाकथित विकास कार्य के लिए इन पेड़ों की बलि चढ़ाना बेहद जरूरी ही था, तो प्रशासन ने इसके बदले नए पौधे लगाने की क्या योजना बनाई है? क्या जितने पेड़ काटे जा रहे हैं, उसके दस गुना पेड़ लगाने की गारंटी कोई अधिकारी लिखित में देगा?
फिलहाल, इस ‘डेथ वारंट’ की खबर ने पूरे हजारीबाग के सोशल मीडिया से लेकर चौक-चौराहों तक एक बड़ी बहस छेड़ दी है। अब देखना यह है कि प्रशासन पर्यावरण प्रेमियों की इस चीख को सुनता है या फिर चंद रुपयों और फाइलों के चक्कर में इन 21 जिंदगियों को सदा के लिए सुला दिया जाता है।


