विकास के दावों के बीच बुनियादी सुविधाओं की जमीनी हकीकत पर सवाल; गांवों में 6-7 घंटे तो शहर में 10-12 घंटे बिजली मिलने का दावा, जलापूर्ति और जर्जर सड़कों से भी बढ़ी परेशानी
हजारीबाग।
“मुस्कुराइए, आप हजारीबाग में हैं…” सुनने में यह वाक्य भले ही शहर की पहचान और अपनापन दिखाता हो, लेकिन आज अगर हजारीबाग के आम नागरिक से पूछा जाए कि मुस्कुराने की वजह क्या है, तो शायद जवाब देने से पहले उसे बिजली, पानी और सड़क की अपनी समस्याएं याद आएंगी।
हजारीबाग में विकास को लेकर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। नई परियोजनाओं, सड़कों, जलापूर्ति और बिजली व्यवस्था को बेहतर बनाने की बातें होती हैं। लेकिन दूसरी ओर शहर और गांवों में रहने वाले लोगों की रोजमर्रा की परेशानियां यह सवाल खड़ा करती हैं कि आखिर विकास का असर आम जिंदगी में कितना दिखाई दे रहा है?
तीन बुनियादी जरूरतें—बिजली, पानी और सड़क—आज जिले में चर्चा का सबसे बड़ा विषय बनती जा रही हैं।
बिजली कटती है तो पानी भी रुक जाता है
हजारीबाग में बिजली की समस्या का असर केवल घरों की रोशनी या पंखे तक सीमित नहीं है। बिजली जाते ही पानी की मोटर बंद हो जाती है और इसके साथ घरों की जलापूर्ति भी प्रभावित होती है।
ग्रामीण क्षेत्रों में कई जगहों पर 24 घंटे में मुश्किल से 6 से 7 घंटे बिजली मिलने की शिकायत है। शहर में भी कई इलाकों में करीब 10 से 12 घंटे आपूर्ति रहने की बात सामने आती रही है। बिजली की मांग और उपलब्धता के बीच अंतर होने पर समस्या और बढ़ जाती है।
बीते दिनों केटीपीएस के ट्रांसफॉर्मर संकट ने बिजली आपूर्ति व्यवस्था की कमजोरियों को सामने ला दिया था। उस दौरान मांग करीब 150 से 180 मेगावाट तक पहुंचने के मुकाबले कई मौकों पर आपूर्ति 70 से 90 मेगावाट के आसपास रहने की स्थिति बताई गई। इसके अलावा ट्रांसफॉर्मर खराबी, लोकल फॉल्ट और बार-बार ट्रिपिंग ने उपभोक्ताओं की परेशानी बढ़ाई।
ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति और चुनौतीपूर्ण होने की शिकायतें हैं। लाखे-मंडई ग्रामीण फीडर को लेकर भी उपभोक्ताओं की समस्याएं सामने आती रही हैं।
सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि बिजली कब आएगी। असली सवाल यह है कि बिजली की अनियमितता के बीच घरों में पानी कैसे पहुंचेगा, बच्चों की पढ़ाई कैसे होगी और छोटे कारोबार कितनी देर तक चल पाएंगे?
पानी की योजनाएं कागज पर, नल में पानी का इंतजार
हजारीबाग में जलापूर्ति सुधारने के लिए अलग-अलग योजनाओं और निरीक्षण की बातें होती रही हैं। अमृत योजना से लेकर आवासीय क्षेत्रों तक पानी पहुंचाने की कवायद जारी रहने की जानकारी सामने आती रही है।
लेकिन आम लोगों की जरूरत इससे कहीं सीधी है—नल में नियमित पानी चाहिए।
कई घरों में पानी की व्यवस्था मोटर पर निर्भर है। ऐसे में बिजली की कटौती सीधे पानी की उपलब्धता को प्रभावित करती है। यानी एक समस्या दूसरी समस्या को जन्म देती है।
बिजली गई तो मोटर बंद, मोटर बंद तो पानी बंद और पानी बंद तो परिवारों को वैकल्पिक व्यवस्था करनी पड़ती है। इस पूरे चक्र का सबसे ज्यादा असर उन परिवारों पर पड़ता है, जिनके पास पानी जमा करने या वैकल्पिक स्रोत की पर्याप्त सुविधा नहीं है।
सड़कें बनीं तो रखरखाव कौन करेगा?
बिजली और पानी के बाद हजारीबाग की सड़कों की स्थिति भी चिंता का विषय है। शहर के कई हिस्सों से लेकर ग्रामीण इलाकों तक सड़क पर गड्ढे, जलजमाव और अधूरे निर्माण की शिकायतें समय-समय पर सामने आती रही हैं।
बारिश के मौसम में समस्या और बढ़ जाती है। पानी जमा होने के बाद सड़क का टूटा हिस्सा दिखाई नहीं देता और दोपहिया वाहन चालकों के लिए दुर्घटना का खतरा बढ़ जाता है। बड़े वाहनों के आवागमन से भी जर्जर सड़कों पर स्थिति कठिन हो जाती है।
केरेडारी के कालेश्वरी बागी मार्ग का करीब 500 मीटर हिस्सा जमीन विवाद के कारण लंबे समय तक पक्की सड़क से जुड़ नहीं सका। वहीं शहर के बड़ी बाजार की ओर जाने वाले मार्गों की स्थिति को लेकर भी लोगों की शिकायतें सामने आती रही हैं।
यहां सवाल सड़क बनाने से आगे का है—सड़क बनने के बाद उसकी नियमित मरम्मत और निगरानी की जिम्मेदारी कौन निभाएगा?
बारिश में सड़क या तालाब?
हजारीबाग में बारिश शुरू होते ही सड़क और जलजमाव की समस्या एक साथ दिखाई देने लगती है। कई स्थानों पर पानी जमा होने के कारण सड़क और नाली के बीच का अंतर तक समझना मुश्किल हो जाता है।
बारिश के दौरान जलजमाव, टूटे सड़क किनारे और कहीं-कहीं गिरे पेड़ यातायात को भी प्रभावित करते हैं। बारिश खत्म होने के बाद पानी तो हट जाता है, लेकिन सड़क के गड्ढे और टूटे हिस्से लोगों के लिए खतरा बने रहते हैं।
जनता का सवाल है कि सड़क निर्माण पर खर्च होने वाली राशि के साथ उसके रखरखाव और गुणवत्ता की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए या नहीं?
बड़ी परियोजनाओं के बीच छोटी जरूरतें क्यों अधूरी?
हजारीबाग में बड़ी सड़क परियोजनाओं, छह लेन की तैयारियों, बिजली सुधार और जलापूर्ति योजनाओं की चर्चा होती है। निश्चित रूप से ये योजनाएं जिले के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण हैं।
लेकिन आम नागरिक के लिए विकास का पहला अनुभव अक्सर किसी बड़े प्रोजेक्ट से नहीं, बल्कि उसके घर की बिजली, नल के पानी और घर के सामने की सड़क से होता है।
यही वजह है कि विकास की बड़ी तस्वीर और जमीन पर लोगों के अनुभव के बीच अंतर को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
गांव का सवाल है—बिजली कब नियमित होगी?
शहर का सवाल है—पानी कब लगातार मिलेगा?
सड़क पर चलने वाले का सवाल है—गड्ढों और जलजमाव से कब राहत मिलेगी?
रामनवमी में सड़क की चिंता, बाकी दिनों में कौन पूछेगा?
हजारीबाग की पहचान में रामनवमी का विशेष स्थान है। त्योहार के दौरान शहर की व्यवस्था, सड़क, यातायात और बिजली को लेकर प्रशासनिक एवं राजनीतिक सक्रियता बढ़ जाती है।
लेकिन सवाल यह है कि जो सड़कें त्योहार के समय जरूरी हो जाती हैं, वे साल के बाकी दिनों में उतनी ही महत्वपूर्ण क्यों नहीं रहतीं?
जनता को सिर्फ पर्व-त्योहार के समय बेहतर सड़क, बिजली और व्यवस्था नहीं चाहिए। इन सुविधाओं की जरूरत पूरे साल रहती है।
लोगों का सवाल नेताओं से भी है—जब चुनाव के समय गांव और मोहल्लों तक पहुंचना संभव है, तो रोजमर्रा की समस्याओं से जूझ रहे लोगों के बीच नियमित रूप से पहुंचकर उनकी परेशानियों का समाधान क्यों नहीं तलाशा जाता?
जनता को चाहिए सुविधा, सिर्फ दावा नहीं
हजारीबाग की जनता कोई असाधारण सुविधा नहीं मांग रही। उसकी अपेक्षा बेहद सामान्य है—पर्याप्त बिजली, नियमित पानी और सुरक्षित सड़क।
अगर गांवों में बिजली की उपलब्धता सीमित रहे, शहर के लोग घंटों कटौती झेलें, बिजली के साथ पानी भी रुक जाए और बारिश के बाद सड़कों पर गड्ढे व जलजमाव परेशानी बढ़ाएं, तो विकास के दावों पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
हजारीबाग के लोगों को योजनाओं की घोषणा से ज्यादा उनके समयबद्ध और प्रभावी क्रियान्वयन की जरूरत है। अब जरूरत इस बात की है कि बिजली, पानी और सड़क जैसी बुनियादी समस्याओं को प्राथमिकता देकर स्थायी समाधान की दिशा में काम हो।
फिलहाल हजारीबाग के लिए व्यंग्य में कही जाने वाली वही लाइन सबसे ज्यादा सटीक लगती है—
**“मुस्कुराइए… आप हजारीबाग में हैं।
यहां बिजली का इंतजार है, पानी की चिंता है और सड़क पर संभलकर चलना है।”**


