हजारीबाग: “क्या सरकार और प्रशासन को हमारा घर आवंटित करने के लिए किसी बड़े हादसे का इंतजार है? क्या जब हमारे जर्जर घर का मलबा हमारे ऊपर गिर जाएगा और परिवार में किसी की मृत्यु हो जाएगी, तब सरकारी अमला जागकर हमें आवास मुहैया कराएगा?” यह दर्दभरी और तीखी चीख कटकमदाग प्रखंड अंतर्गत मसरातू पंचायत के वार्ड नंबर एक के रहने वाले एक बेबस मजदूर मोहम्मद मिराज की है। यह सिर्फ एक शिकायत नहीं है, बल्कि झारखंड के ग्रामीण इलाकों में धरातल पर दम तोड़ रही कल्याणकारी योजनाओं और प्रशासनिक संवेदनहीनता का एक ऐसा जीवंत दस्तावेज है, जो व्यवस्था के मुंह पर करारा तमाचा जड़ता है।
जर्जर मिट्टी का घर, किसी और के यहाँ रात गुजारने की बेबसी
ग्राउंड जीरो से मिली जानकारी के अनुसार, मोहम्मद मिराज का पूरा परिवार जिसमें उनकी बूढ़ी विधवा मां (खैरुन निशा), पत्नी और चार छोटे-छोटे मासूम बच्चे शामिल हैं, एक अत्यंत जर्जर कच्चे मिट्टी के मकान में रहने को विवश हैं। घर की स्थिति इतनी भयावह हो चुकी है कि वह पूरी तरह क्षतिग्रस्त होकर आधा जमींदोज हो चुका है। हाल ही में घर के दो कमरे पूरी तरह ढह गए, जिसके बाद परिवार ने मलबे को साफ कर अपने स्तर से सीमेंट का डीपीसी (DPC) स्तर तक का ढांचा खड़ा किया है ताकि यदि कभी सरकारी सहायता मिले तो काम आगे बढ़ाया जा सके।
बरसात के दिनों में इस घर की स्थिति नरक से भी बदतर हो जाती है। छतों से पानी इस कदर टपकता है कि पूरा घर तालाब में तब्दील हो जाता है। जान माल के भारी खतरे को देखते हुए इस गरीब परिवार को रात के वक्त डर के साए में किसी दूसरे ग्रामीण के घर जाकर शरण लेनी पड़ती है कि कहीं सोते समय मिट्टी की भारी दीवारें इन मासूमों पर न गिर जाएं।
📉 अंतहीन चक्करों का गणित: ब्लॉक से लेकर समाहरणालय तक की दौड़
मोहम्मद मिराज पेशे से एक दिहाड़ी मजदूर हैं जो पेंट (पुताई) का काम करके अपने परिवार का पेट पालते हैं। पिता का देहांत सन् 2007 में ही हो चुका है। घर के अकेले कमाऊ सदस्य होने के बावजूद वे पिछले 5-6 वर्षों से केवल दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं।
⏳ 11 वर्षों की प्रशासनिक उदासीनता की टाइमलाइन:
• 2015: प्रधानमंत्री आवास योजना की आधिकारिक लिस्ट में मां (खैरुन निशा) का नाम शामिल हुआ।
• 2015-2020: कई बार ब्लॉक के अधिकारियों द्वारा फिजिकल वेरिफिकेशन और छानबीन की गई।
• 2021-2024: दर्जनों बार जियो टैग (Geo-Tagging) की प्रक्रिया पूरी की गई।
• वर्तमान स्थिति: ब्लॉक से लेकर समाहरणालय (कलेक्टर ऑफिस) तक आवेदन पेंडिंग, फंड न होने का रोना।
पीड़ित का आरोप है कि जब भी वे इस गंभीर समस्या को लेकर मसरातू पंचायत की मुखिया ज्योति कुमारी या उनके सारे कार्यों का प्रबंधन देखने वाले उनके पति सह मुखिया प्रतिनिधि शंभू गोप के पास जाते हैं, तो उन्हें हर बार एक ही घिसा-पिटा आश्वासन मिलता है—”बाबू, अभी फंड में पैसा नहीं आया है।”
पक्के मकान वालों को खैरात, पात्रों को डीबीटी का बहाना
इस मामले में सबसे बड़ा विरोधाभास और भ्रष्टाचार का कोण तब सामने आता है जब मोहम्मद मिराज सवाल उठाते हैं कि अगर सचमुच फंड में पैसा नहीं है, तो पिछले एक से दो महीनों के भीतर गांव के उन रसूखदार और संपन्न लोगों को आवास का आवंटन कैसे कर दिया गया जिनके पास पहले से ही कंक्रीट के मजबूत और आलीशान मकान मौजूद हैं?
जब पीड़ित ब्लॉक कार्यालय के चक्कर काटता है, तो वहां के बाबू और अधिकारी तकनीकी बहाने बनाते हैं कि उनका पैसा इसलिए अटक जाता है क्योंकि बैंक खाते में डीबीटी (Direct Benefit Transfer) सक्रिय नहीं है। जबकि सच्चाई यह है कि उसी बैंक खाते में उनकी वृद्ध मां को नियमित रूप से वृद्धा पेंशन का लाभ मिल रहा है। इस तकनीकी पेंच को भी मोहम्मद मिराज ने बैंक जाकर पूरी तरह ठीक करवा लिया है। अब स्थिति यह है कि अंचल अधिकारी (सीओ) मुखिया से लिखित रिपोर्ट लाने को कहते हैं और मुखिया सिर्फ फोन पर खोखला आश्वासन देकर अपना पल्ला झाड़ लेती हैं।
खुली जांच की चुनौती, क्या मिलेगा हक?
थक-हारकर अब पीड़ित मोहम्मद मिराज ने प्रशासन और सरकार को खुली चुनौती दी है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा है कि सरकार या जिला प्रशासन का कोई भी ईमानदार अधिकारी आकर उनके घर की जमीनी हकीकत का निष्पक्ष निरीक्षण और जांच करे। यदि जांच में वे इस आवास योजना के हकदार पाए जाते हैं, तो उन्हें तुरंत न्याय दिया जाए और यदि तंत्र को लगता है कि एक जर्जर मिट्टी के मकान में सात जिंदगियों का घुट-घुट कर रहना पात्रता की श्रेणी में नहीं आता, तो वे यह मांग भी छोड़ देंगे। अब देखना यह है कि हजारीबाग जिला प्रशासन इस चीख को सुनता है या किसी बड़े हादसे के बाद मुआवजे की फाइल लेकर गांव पहुंचता है।
मुखिया प्रतिनिधि ने आधिकारिक तौर पर पक्ष रखते हुए कहा:
“पंचायत क्षेत्र में विकास कार्यों और आवास आवंटन में किसी भी प्रकार का कोई पक्षपात या भेदभाव नहीं किया जा रहा है। मोहम्मद मिराज के परिवार की स्थिति वाकई दयनीय है और उनका नाम सूची में भी शामिल है, लेकिन वर्तमान में विभाग की ओर से फंड (पैसा) उपलब्ध नहीं होने के कारण उन्हें आवास मुहैया कराने में तकनीकी अड़चन आ रही है। जैसे ही ब्लॉक या जिला स्तर से नए वित्तीय वर्ष का फंड आवंटित किया जाता है, इस परिवार को पहली प्राथमिकता के आधार पर आवास का लाभ दिया जाएगा। डीबीटी या अन्य जो भी तकनीकी त्रुटियां ब्लॉक स्तर पर लंबित हैं, उन्हें भी जल्द से जल्द दूर कराने का प्रयास किया जा रहा है।”


