मुस्कुराइये आप हजारीबाग में हैं! सदर और बड़कागांव को जोड़ने वाले इस इलाके का दर्द सुन कांप जाएगी रूह, न सड़क, न पानी, शौचालय के लिए आज भी जंगल जाते हैं लोग

संध्या न्यूज ब्यूरो
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हजारीबाग (संध्या न्यूज ब्यूरो): “सड़क नहीं है साहब, पीने के पानी की कोई समुचित व्यवस्था नहीं है, और बहू-बेटियों को शौचालय के लिए आज भी जंगलों का रुख करना पड़ता है। क्या करें जनाब, हमें अब ऐसे ही नरकीय जीवन में रहने की आदत हो गई है!” ये शब्द हमारे नहीं, बल्कि उन ग्रामीणों का सामूहिक दर्द और चीख है, जो पिछले कई दशकों से हजारीबाग के सुदूर ग्रामीण और वन क्षेत्रों में जीवन बसर कर रहे हैं। संध्या न्यूज़ (Sandhya News) ने यह ठान लिया है कि हम उन दबे-कुचले और उपेक्षित लोगों की बुलंद आवाज बनेंगे, जिनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है। हमारे रिपोर्टर उन दुर्गम क्षेत्रों का दौरा कर सच्चाई सामने लाएंगे, जहां एसी गाड़ियों में बैठने वाले बड़े अधिकारी और पदाधिकारी कभी कदम तक नहीं रखते। हम इन ग्रामीणों के हक की आवाज को सरकार से लेकर प्रशासनिक अमले और स्थानीय जनप्रतिनिधियों के कानों तक पहुंचाकर दम लेंगे।

दूरी मात्र 15 किलोमीटर, लेकिन विकास के मामले में 50 साल पीछे!

हजारीबाग जिला मुख्यालय से अपनी यात्रा शुरू करते हुए जब हमारी टीम सदर विधानसभा और बड़कागांव को जोड़ने वाले ग्रामीण इलाके की ओर बढ़ी, तो जमीनी हकीकत देखकर आंखें फटी की फटी रह गईं। जिला मुख्यालय से इस क्षेत्र की दूरी मात्र 15 से 20 किलोमीटर है, लेकिन विकास के नाम पर यहां सिर्फ सन्नाटा पसरा है।

समाजसेवी सच्चिदानंद पांडे उर्फ सच्चू पांडे की चार चक्का गाड़ी गांव से करीब 6 किलोमीटर पहले ही रुक गई। वजह? आगे सड़क नाम की कोई चीज ही नहीं थी, सिर्फ पत्थरों और गड्ढों का अंबार था।

समाजसेवी सच्चिदानंद पांडे उर्फ सच्चू पांडे ने व्यवस्था पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा, “यह बेहद शर्मनाक है कि जिला मुख्यालय के इतने करीब होने के बावजूद इस सड़क की हालत इतनी बदतर है। यहां कोई बीमार पड़ जाए तो उसे अस्पताल ले जाना भगवान भरोसे है।”

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जंगलों के बीच बसे आमझरी गांव का सच: विकास का रास्ता भटका सिस्टम!

कठिन रास्तों को पार करते हुए संध्या न्यूज़ की टीम बड़कागांव प्रखंड के चंदौल पंचायत अंतर्गत आमझरी गांव पहुंची। यह गांव पूरी तरह से घने जंगलों के बीच बसा है। गांव तक जाने के लिए जो रास्ता है, वहां बड़े-बड़े बोल्डर (पत्तड़), बालू और संकरी पगडंडियां हैं। लगभग 250 से 300 की आबादी वाले इस कुर्मी महतो बहुल क्षेत्र में बुनियादी सुविधाएं शून्य हैं।

स्थानीय महिलाओं ने रोते हुए अपनी आपबीती सुनाई। उन्होंने बताया कि सड़क, बिजली, पानी और शौचालय जैसी मूलभूत सुविधाओं से उन्हें पूरी तरह वंचित रखा गया है। ग्रामीणों ने कहा, “अगर हमें किसी जरूरी काम से बड़कागांव या हजारीबाग जाना हो, तो आधे घंटे का सफर तय करने में 2 से 3 घंटे लग जाते हैं। पंचायत से लेकर ब्लॉक (प्रखंड) तक कई बार लिखित शिकायत की, लेकिन प्रशासनिक सिस्टम अंधा और बहरा हो चुका है। विकास का रास्ता शायद इस गांव में आते-आते भटक जाता है।”

ग्रामीण महिला फूल कुमारी ने अपना दर्द बयां करते हुए कहा, “हम महिलाओं के लिए सबसे बड़ी मुसीबत शौचालय की है। सरकार खुले में शौच मुक्त (ODF) का ढिंढोरा पीटती है, लेकिन हमें आज भी जंगलों में जाना पड़ता है, जहां हमेशा जंगली जानवरों का खतरा बना रहता है।”

चौकियां गांव की कहानी: झरने और गंदे तालाब का पानी पीने को मजबूर हैं लोग

आमझरी गांव से महज 1 किलोमीटर की दूरी पर बसा है एक और गांव—चौकियां। जंगलों के बीच से होकर गुजरने वाली इसकी ढलान भरी सड़क बेहद थका देने वाली और खतरनाक है। इस रास्ते में संध्या न्यूज़ की टीम ने जो देखा, वो आधुनिक भारत के दावों पर एक बड़ा तमाचा है।

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रास्ते में एक छोटा सा तालाब नुमा गड्ढा मिला, जिसके एक छोर पर गांव की महिलाएं बर्तन धो रही थीं और कपड़े साफ कर रही थीं, वहीं दूसरी ओर कुछ मासूम बच्चे उसी मटमैले पानी में नहा रहे थे। पूछने पर महिलाओं ने बताया कि यहां पीने के पानी का कोई साधन नहीं है। पहले लोग झरने का पानी पीते थे, लेकिन अब खुद से खोदे गए कुएं या इसी दूषित तालाब का पानी पीने को मजबूर हैं।

ग्रामीणों ने आक्रोश व्यक्त करते हुए कहा, “चुनाव के समय नेता और उनके चमचे-शागिर्द हाथ जोड़कर वोट मांगने तो आ जाते हैं, लेकिन जैसे ही चुनाव जीतते हैं, पूरे 5 साल के लिए कुंभकर्णी नींद सो जाते हैं। हमें तो याद भी नहीं कि आखिरी बार किस सरकारी अधिकारी ने इस गांव का दौरा किया था।”

कैंप लगाने वाली सरकार की नजरों से क्यों ओझल हैं ये गांव?

एक तरफ सूबे की सरकार पंचायत स्तर पर बड़े-बड़े कैंप लगाकर जनता की समस्याओं के ऑन-द-स्पॉट निपटारे का दावा करती है, वहीं दूसरी तरफ हजारीबाग का यह इलाका यह सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर डिजिटल इंडिया और विकास की बड़ी-बड़ी बातें इन गरीबों तक क्यों नहीं पहुंचतीं?

हमें इस जमीनी हकीकत से रूबरू कराने वाले समाजसेवी सच्चिदानंद पांडे ने कहा कि केवल टीआरपी वाली जनरल खबरें करने से कोई फायदा नहीं है। असली पत्रकारिता वही है जो उस जनता का दर्द साझा करे, जिसने आज तक विकास की रोशनी ही नहीं देखी। संध्या न्यूज़ ऐसे सच्चे समाजसेवियों को सलाम करता है, जो खुद चलकर मीडिया के माध्यम से इन बेजुबानों की आवाज बन रहे हैं।

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हजारीबाग उपायुक्त (DC) ने दिया ठोस आश्वासन

इस गंभीर मुद्दे और ग्रामीणों के अमानवीय हालातों को लेकर संध्या न्यूज़ ने सीधे हजारीबाग उपायुक्त (DC) से बात की। उपायुक्त ने मामले की गंभीरता को समझते हुए तुरंत संज्ञान लिया और संध्या न्यूज़ को भरोसा दिलाते हुए कहा:

“यह पूरा मामला मेरे संज्ञान में आया है। यह बेहद संवेदनशील विषय है। मैं जल्द ही संबंधित अधिकारियों की टीम भेजकर वहां सड़क, पानी और शौचालय की समस्याओं का त्वरित निष्पादन (समाधान) कराऊंगा। जब इस क्षेत्र का विकास सुनिश्चित हो जाएगा, तब मैं खुद आपके चैनल के माध्यम से जनता से बात करूंगा।”

संध्या न्यूज़ का संकल्प

किसी भी चीज की हकीकत जानने के लिए एयरकंडीशनर कमरों से निकलकर धूप और धूल में जाना पड़ता है। संध्या न्यूज़ वही माध्यम है जो समाज, सरकार, प्रशासनिक पदाधिकारियों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों की सोई हुई अंतरात्मा को जगाएगा। हम तब तक चैन से नहीं बैठेंगे, जब तक इन जंगलों में रहने वाले देश के असली नागरिकों को उनका अधिकार नहीं मिल जाता।

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