संध्या न्यूज ब्यूरो / हजारीबाग: Hazaribagh Local News: शहर की व्यस्त सड़कों और मुख्य चौराहों से गुजरते हुए अमूमन लोगों की नजरें दुकानों के रंग-बिरंगे विज्ञापनों और होर्डिंग्स पर पड़ती हैं। व्यापार चमकाने की होड़ में बैनर-पोस्टर का सहारा लेना बेहद आम बात है, लेकिन हजारीबाग के झील रोड और जिला स्कूल रोड के मुहाने पर जब राहगीरों की नजर एक विशेष मछली दुकान के होर्डिंग पर ठहरती है, तो वहां सन्नाटा खिंच जाता है। भगवा रंग में रंगे उस विशालकाय पोस्टर के शीर्ष पर ‘ॐ’ का पवित्र चिह्न अंकित है, साथ ही ‘जय श्री राम’ का उद्घोष और धार्मिक ध्वजा भी लहरा रही है।
पोस्टर के एक कोने पर पारंपरिक वेशभूषा में एक युवक हाथ में कट्टा (मछली काटने का औजार) थामे खड़ा है। इस दृश्य को देखकर हर गुजरने वाला एक पल के लिए ठिठक जाता है। यह कोई अकेला मामला नहीं है, बल्कि जिले के कई इलाकों में मांस और मछली के व्यापार में धार्मिक प्रतीकों और देवी-देवताओं की तस्वीरों का धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है, जिसने अब एक गहरे सस्पेंस और वैचारिक टकराव को जन्म दे दिया है।
पवित्रता की कसौटी पर व्यापार का नया तौर-तरीका
सनातन परंपरा में ‘ॐ’ को केवल एक अक्षर नहीं बल्कि सृष्टि की मूल ध्वनि और साक्षात प्रणव मंत्र का दर्जा हासिल है। भगवान के नाम, त्रिशूल और धार्मिक ध्वजा श्रद्धा की पराकाष्ठा के प्रतीक माने जाते हैं। समाज का एक बड़ा प्रबुद्ध वर्ग अब इस बात को लेकर बेहद हैरान और चिंतित है कि जिन प्रतीकों को घरों के पूजा-घरों, देवालयों और शुभ मांगलिक कार्यों में अत्यंत आदर के साथ स्थापित किया जाता है, वे आज मांस के लोथड़ों और मछली के खून से सने काउंटर के पीछे विज्ञापन बनकर टंग रहे हैं। इस विरोधाभास ने शहर के भीतर एक सुगबुगाहट तेज कर दी है कि क्या यह अनजाने में की गई कोई भूल है या फिर इसके पीछे आस्था के नाम पर ग्राहकों को आकर्षित करने की कोई सोची-समझी रणनीति काम कर रही है।
भावनाओं के समंदर में उठती आक्रोश की लहरें
तमाम धार्मिक ग्रंथों और सामाजिक मान्यताओं के अनुसार, तामसी प्रवृत्ति के व्यापारों जैसे मांस, मछली या मदिरा के क्रय-विक्रय वाले स्थानों पर सात्विक और परम पवित्र प्रतीकों का प्रदर्शन उनकी गरिमा को सीधे तौर पर ठेस पहुंचाता है। स्थानीय प्रबुद्ध नागरिकों और धर्मप्रेमियों का स्पष्ट मत है कि किसी भी व्यक्ति को अपने निजी व्यवसाय के प्रचार-प्रसार की पूरी स्वतंत्रता है, लेकिन जब व्यापार के मंच पर आस्था का घालमेल होने लगे तो सीमाएं धुंधली पड़ने लगती हैं। विवाद की इस पृष्ठभूमि में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या केवल व्यावसायिक लाभ या नाम के आगे विशेषण जोड़ने के लिए इन पावन चिह्नों की मर्यादा को दांव पर लगाया जा सकता है। इस संवेदनशील विषय को लेकर शहर के भीतर वैचारिक मंथन का दौर बेहद कड़े और गंभीर मोड़ पर पहुंच चुका है।
युवाओं की अनूठी पहल और सुलह का नया रास्ता
हजारीबाग के सजग युवाओं और कुछ सामाजिक साथियों ने जब इस दृश्य की गंभीरता को भांपा, तो उन्होंने आपस में बैठकर एक बेहद गंभीर और गोपनीय रणनीति तैयार की है। कानून व्यवस्था या किसी भी तरह के सामाजिक टकराव को पूरी तरह टालने के लिए युवाओं की इस टोली ने एक बेहद सराहनीय और विनम्र रास्ता चुना है।
तय किया गया है कि किसी भी प्रकार के हंगामे या प्रशासनिक शिकायत से पहले, वे सीधे संबंधित दुकानदारों से मुलाकात करेंगे। युवा बेहद आदरपूर्वक इन दुकानदारों को सनातन परंपरा के नियमों और पवित्र प्रतीकों की गरिमा का बोध कराएंगे। उनसे विनम्र अनुरोध किया जाएगा कि वे अपनी दुकानों से इन धार्मिक चित्रों और मंत्रों को हटाकर केवल सामान्य व्यावसायिक बैनर लगाएं, जिसमें दुकान का नाम, पता और मोबाइल नंबर जैसी जरूरी जानकारियां ही सीमित रहें। अब देखना यह है कि युवाओं की यह शांतिपूर्ण और गांधीवादी मुहिम हजारीबाग के व्यापारियों के दिलों पर कितना असर डाल पाती है और क्या यह विवाद बिना किसी कड़वाहट के सुलझ पाता है।


