संध्या न्यूज विशेष ग्राउंड रिपोर्ट | टाटीझरिया (हजारीबाग)
Jal Nal Yojna Hazaribagh: सूरज की पहली किरण अभी हजारीबाग के टाटीझरिया प्रखंड के परतगा गांव पर ठीक से पड़ी भी नहीं होती कि सन्नाटे को चीरती हुई कुछ आवाजें आने लगती हैं। ये आवाजें किसी उत्सव की नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व की जंग लड़ रहे ग्रामीणों के कदमों की हैं। महिलाएं, बुजुर्ग और हाथ में छोटे-छोटे बर्तन थामे बच्चे एक बार फिर उसी रास्ते पर निकल पड़े हैं, जो उन्हें गांव से दूर बहती उस नदी की ओर ले जाता है जिसके मटमैले पानी से वे अपनी प्यास बुझाते हैं। यह परतगा गांव की वो कड़वी और दर्दनाक हकीकत है, जो फाइलों में चमकते ‘हर घर जल’ के दावों को सीधे चुनौती दे रही है।
जब उम्मीद की मीनार सिर्फ एक ‘शोपीस’ बनकर रह गई
करीब दो साल पहले जब गांव के बीचों-बीच प्रधानमंत्री जल नल योजना के तहत करोड़ों रुपये की लागत से पानी की विशाल टंकी खड़ी की जा रही थी, तो ग्रामीणों की आंखों में एक अलग चमक थी। बूढ़ी आंखों ने ख्वाब देखा था कि अब जिंदगी के आखिरी पड़ाव में उन्हें पानी के लिए कोसों दूर नहीं भटकना पड़ेगा। युवाओं को लगा था कि विकास की बयार आखिरकार उनके दरवाजे तक आ ही गई। हर घर तक पाइपलाइन बिछा दी गई, नलों के कनेक्शन जोड़ दिए गए।
लेकिन किसे पता था कि यह पूरी कवायद सिर्फ एक मुगालता साबित होगी? आज दो साल बीत जाने के बाद भी उन चमचमाते नलों से पानी की एक बूंद तक नहीं टपकी है। गांव के ऊंचे छोर पर खड़ी वह विशालकाय पानी की टंकी आज विकास की नहीं, बल्कि प्रशासनिक उदासीनता और दम तोड़ती सरकारी व्यवस्था की मसीहा नजर आती है। करोड़ों का यह प्रोजेक्ट आज परतगा के लोगों के लिए महज एक शोपीस से ज्यादा कुछ नहीं है।
Jal Nal Yojna Hazaribagh: चापाकल हुए बीमार, चंदे के सहारे बुझ रही है परतगा की प्यास
Jal Nal Yojna Hazaribagh: पेयजल की आपूर्ति शुरू न होने का दर्द तब और गहरा जाता है जब गांव के पारंपरिक जल स्रोत भी एक-एक कर साथ छोड़ने लगते हैं। परतगा गांव में लगे कई चापाकल समय की मार और रखरखाव के अभाव में अक्सर दम तोड़ देते हैं। हैरान करने वाली बात यह है कि जब भी कोई चापाकल खराब होता है, तो उसकी मरम्मत के लिए प्रशासन के गलियारों से कोई आवाज नहीं आती। कोई सरकारी मिस्त्री या मैकेनिक इस सुदूर गांव की सुध लेने नहीं पहुंचता।
ऐसी लाचारी में गांव के लोग एक बार फिर अपनी फटी जेबों को टटोलते हैं। सूखी जीभ और तड़पते बच्चों का चेहरा देखकर ग्रामीण आपस में चंदा इकट्ठा करते हैं। पाई-पाई जोड़कर जो राशि जमा होती है, उससे मिस्त्री बुलाकर चापाकलों की मरम्मत कराई जाती है। एक तरफ जहाँ सरकारी विज्ञापनों में हर ग्रामीण को बिना किसी परेशानी के स्वच्छ पेयजल देने की बातें बढ़-चढ़कर की जाती हैं, वहीं दूसरी तरफ परतगा की इस जमीनी हकीकत में लोगों को पानी जैसी बुनियादी जरूरत के लिए भी अपनी गाढ़ी कमाई से चंदा देना पड़ रहा है।
व्यवस्था के खिलाफ सुलगता आक्रोश: अब आर-पार की लड़ाई का मन
Jal Nal Yojna Hazaribagh: चिलचिलाती धूप और गर्मी के दिनों में यहाँ का मंजर किसी त्रासदी से कम नहीं होता। जब नदी का जलस्तर घटने लगता है और चापाकल हांफने लगते हैं, तब पानी के लिए लोगों को मीलों का सफर तय करना पड़ता है। पानी के इंतजार में बीतते घंटों ने यहाँ के युवाओं की पढ़ाई और महिलाओं की सेहत को बुरी तरह प्रभावित किया है। दो सालों का यह लंबा इंतजार अब परतगा गांव के वासियों के सब्र का बांध तोड़ रहा है।
प्रशासनिक उदासीनता के खिलाफ ग्रामीणों के दिलों में अब एक गहरा आक्रोश सुलग रहा है। परतगा के ग्रामीणों ने अब सीधे तौर पर जिला प्रशासन और पेयजल एवं स्वच्छता विभाग के आला अधिकारियों को चेतावनी दी है। उनकी मांग बेहद स्पष्ट है— इस पूरी योजना की एक उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच कराई जाए कि आखिर करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी पानी जमीन से ऊपर क्यों नहीं चढ़ा? तकनीकी कमियों को तुरंत दुरुस्त कर नलों में पानी छोड़ा जाए, अन्यथा अपनी प्यास बुझाने के लिए तड़पते ये ग्रामीण अब चुप बैठने वाले नहीं हैं। अगर समय रहते जलापूर्ति शुरू नहीं हुई, तो विभाग के खिलाफ एक बड़ा जन-आंदोलन तय है।


