दो लाख से अधिक बच्चों के भविष्य की जिम्मेदारी, कहीं शिक्षक कम तो कहीं विषयवार पद खाली; 118 हाई व प्लस टू स्कूलों में सिर्फ एक में नियमित प्रधानाध्यापक
हजारीबाग। शिक्षक दिवस पर जब देशभर में शिक्षकों के योगदान और उनके समर्पण को सम्मान के साथ याद किया जाता है, उसी समय हजारीबाग के सरकारी विद्यालयों की जमीनी तस्वीर कई गंभीर सवाल खड़े करती है। जिले के सरकारी स्कूलों में दो लाख तीस हजार से अधिक बच्चे अपने भविष्य की नींव तैयार कर रहे हैं, लेकिन शिक्षकों की कमी, विषयवार रिक्तियां, प्रधानाध्यापकों के पद खाली रहने और गैर-शैक्षणिक कार्यों का बढ़ता बोझ शिक्षा व्यवस्था की राह में बड़ी चुनौती बन गया है। जिन शिक्षकों के कंधों पर हजारों बच्चों का भविष्य संवारने की जिम्मेदारी है, वे खुद व्यवस्था की कई कमियों से जूझते हुए नजर आ रहे हैं।
गांवों में शिक्षक संकट, शहरों में असमान वितरण
शिक्षा के अधिकार अधिनियम के मानकों के मुताबिक प्राथमिक और मध्य विद्यालयों में छात्र-शिक्षक अनुपात को संतुलित रखना जरूरी है। सामान्य तौर पर प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्तर पर 40 बच्चों पर एक शिक्षक का प्रावधान माना जाता है, जबकि प्राथमिक विद्यालयों में कम से कम दो शिक्षकों की उपलब्धता भी जरूरी है। लेकिन हजारीबाग के ग्रामीण इलाकों के कई सरकारी स्कूलों में तस्वीर इन मानकों से अलग दिखाई देती है।
कई विद्यालयों में एक शिक्षक के जिम्मे 50 से 60 अथवा उससे भी अधिक बच्चों को पढ़ाने की जिम्मेदारी होने की स्थिति सामने आती है। ऐसे में एक शिक्षक को अलग-अलग कक्षाओं के विद्यार्थियों को संभालने के साथ-साथ पढ़ाई का स्तर बनाए रखने की चुनौती रहती है। दूसरी ओर, शहरी क्षेत्र के कुछ विद्यालयों में छात्र संख्या के अनुपात में शिक्षकों की उपलब्धता अपेक्षाकृत बेहतर है। शिक्षक उपलब्धता का यह असमान वितरण ग्रामीण और शहरी शिक्षा व्यवस्था के बीच अंतर को और गहरा कर रहा है।
118 हाई और प्लस टू स्कूल, नियमित प्रधानाध्यापक सिर्फ एक
शिक्षा व्यवस्था की चुनौती केवल प्राथमिक और मध्य विद्यालयों तक सीमित नहीं है। जिले के 118 हाई और प्लस टू विद्यालयों में प्रशासनिक नेतृत्व का संकट भी गंभीर है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इनमें केवल एक विद्यालय में नियमित प्रधानाध्यापक पदस्थापित हैं, जबकि अधिकांश विद्यालय प्रभारी प्रधानाध्यापकों के भरोसे संचालित हो रहे हैं।
प्रधानाध्यापक किसी भी विद्यालय के प्रशासनिक और शैक्षणिक संचालन की महत्वपूर्ण कड़ी होते हैं। लंबे समय तक प्रभारी व्यवस्था रहने से विद्यालयों के प्रशासनिक कामकाज, शैक्षणिक योजना और विभागीय समन्वय पर इसका असर पड़ना स्वाभाविक है।
गणित, विज्ञान और अंग्रेजी के शिक्षकों की कमी बनी बड़ी चुनौती
हाई और प्लस टू विद्यालयों में सबसे गंभीर समस्या विषयवार शिक्षकों की कमी को लेकर है। गणित, विज्ञान और अंग्रेजी जैसे महत्वपूर्ण विषयों में शिक्षकों की कमी का सीधा असर विद्यार्थियों की पढ़ाई पर पड़ रहा है। रिक्त पदों के कारण कई विद्यालयों में उपलब्ध शिक्षकों से दूसरे विषयों की कक्षाएं भी संचालित करानी पड़ती हैं।
कहीं एक शिक्षक को कई कक्षाओं की जिम्मेदारी संभालनी पड़ रही है तो कहीं विषय विशेषज्ञ के अभाव में विद्यार्थियों को दूसरे विषय के शिक्षक से पढ़ना पड़ रहा है। इससे उन विद्यार्थियों के सामने खास चुनौती खड़ी होती है, जो बोर्ड परीक्षाओं और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं। जिले के प्रमुख बालिका विद्यालय भी शिक्षकों की कमी से अछूते नहीं हैं और कई जगह पढ़ाई प्रतिनियुक्त शिक्षकों के सहारे संचालित हो रही है।
क्लासरूम से ज्यादा पोर्टल और गैर-शैक्षणिक कामों में बीत रहा समय
सरकारी विद्यालयों के शिक्षकों की परेशानी केवल शिक्षकों की संख्या तक सीमित नहीं है। पढ़ाने के अलावा उनके जिम्मे कई ऐसे कार्य भी हैं, जिनमें उनका काफी समय खर्च होता है। चुनाव ड्यूटी, जनगणना, विभिन्न सर्वे, मतदाता सूची से जुड़े कार्य, प्रशिक्षण और बैठकों के अलावा विभागीय रिपोर्ट तैयार करने की जिम्मेदारी भी शिक्षकों को निभानी पड़ती है।
डिजिटल व्यवस्था बढ़ने के साथ स्कूलों से जुड़ी जानकारी अलग-अलग पोर्टलों पर अपलोड करने का काम भी शिक्षकों की जिम्मेदारी का हिस्सा बन गया है। बच्चों की उपस्थिति, नामांकन, छात्रवृत्ति और विभिन्न सरकारी योजनाओं से संबंधित आंकड़ों को ऑनलाइन दर्ज करने में भी शिक्षकों का समय जाता है। इसके अलावा पीएम पोषण योजना की निगरानी, रिकॉर्ड और हिसाब-किताब का काम भी विद्यालय स्तर पर शिक्षकों को ही संभालना पड़ता है।
शिक्षक दिवस पर सम्मान के साथ व्यवस्था बदलने की जरूरत
शिक्षक दिवस केवल शिक्षकों को सम्मानित करने का अवसर नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की वास्तविक स्थिति पर विचार करने का भी समय है। हजारीबाग के सरकारी विद्यालयों में शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए केवल नई नियुक्तियां करना पर्याप्त नहीं होगा। जरूरी है कि हर विद्यालय में छात्र संख्या के अनुरूप शिक्षक, विषय के अनुरूप विशेषज्ञ शिक्षक और नियमित प्रधानाध्यापक उपलब्ध हों।
ग्रामीण और शहरी विद्यालयों के बीच शिक्षकों के असमान वितरण को भी दूर करना होगा। साथ ही शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों से मुक्त करने के लिए अलग प्रशासनिक व्यवस्था विकसित करने की जरूरत है। जब शिक्षक का अधिकांश समय पोर्टल, सर्वे, रिपोर्ट और दूसरे विभागीय कार्यों के बजाय कक्षा में बच्चों के साथ बीतेगा, तभी सरकारी विद्यालयों की शिक्षा व्यवस्था वास्तव में मजबूत हो सकेगी।
शिक्षक दिवस पर सवाल सिर्फ यह नहीं कि शिक्षक कितने सम्मानित हैं, बल्कि यह भी है कि उन्हें पढ़ाने के लिए कितनी बेहतर व्यवस्था उपलब्ध कराई गई है।


