हजारीबाग: हजारीबाग शहर को जाम मुक्त करने की आड़ में नगर निगम प्रशासन द्वारा की जा रही अतिक्रमण रोधी कार्रवाई अब एक बेहद गंभीर सामाजिक और राजनीतिक मोर्चे में तब्दील हो चुकी है। पीटीसी चौक से लेकर मटवारी गांधी मैदान मार्ग पर हाल ही में निगम द्वारा चलाए गए अभियान ने न सिर्फ 40 परिवारों के चूल्हे बुझा दिए हैं, बल्कि प्रशासनिक भेदभाव और संवेदनहीनता की एक ऐसी दास्तान लिख दी है जिसने पूरे शहर के प्रबुद्ध नागरिकों को झकझोर कर रख दिया है। इस बर्बर कार्रवाई के विरोध में अब भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) ने सीधे तौर पर मैदान संभाल लिया है। भाकपा की हजारीबाग जिला कमिटी ने नगर निगम की इस दोहरी नीति के खिलाफ जिले में एक बड़े और व्यापक जन आंदोलन का शंखनाद कर दिया है।
- “पहले दुकान टूटेगी, फिर सामान उठाना”— अमानवीयता की हदें पार
- 💔 “मेरा पैर पहले से टूटा है, 5 मिनट दे दीजिए…” — रो पड़ा दिव्यांग अजय
- चुनिंदा कार्रवाई और खुले भेदभाव पर भड़के भाकपा नेता
- “लोन देकर आत्मनिर्भर बनाया, अब दुकान तोड़कर किश्त मांग रहे हैं”
- जनप्रतिनिधियों की चुप्पी पर सवाल; सड़क से अदालत तक जंग की चेतावनी
“पहले दुकान टूटेगी, फिर सामान उठाना”— अमानवीयता की हदें पार
ग्राउंड जीरो से आ रही रिपोर्ट के मुताबिक, पीटीसी-मटवारी मार्ग पर नगर निगम का ‘पॉकेट जेसीबी’ दस्ता इतनी आनन-फानन में पहुंचा कि फुटपाथ दुकानदारों को संभलने तक का मौका नहीं मिला। नियमों और मानवीय संवेदनाओं को पूरी तरह ताक पर रखकर बिना किसी पूर्व लिखित नोटिस या सार्वजनिक मुनादी के दुकानों को ढहाना शुरू कर दिया गया।
इस हड़बड़ाहट और प्रशासनिक क्रूरता के कारण क्षेत्र में चीख-पुकार मच गई। जेसीबी की गर्जना देखकर जब गरीब दुकानदार अपनी जमा-पूंजी और कीमती फल-सब्जियां समेटने के लिए भागे, तो अधिकारियों और पुलिस बल ने उन्हें बेरहमी से पीछे धकेल दिया। तस्करों और अपराधियों जैसा सुलूक करते हुए पीड़ितों से कहा गया, “पहले दुकान टूटेगी, फिर सामान उठाना”। इस अफरा-तफरी में दो फल विक्रेता गंभीर रूप से चोटिल हो गए, जिसमें एक दुकानदार का पैर कट गया और दूसरे का हाथ बुरी तरह जख्मी हो गया। मलबे के नीचे दबने से दुकानदारों का लाखों रुपये का माल पूरी तरह बर्बाद हो गया।
💔 “मेरा पैर पहले से टूटा है, 5 मिनट दे दीजिए…” — रो पड़ा दिव्यांग अजय
इस पूरे दमनकारी अभियान के दौरान प्रशासनिक संवेदनहीनता का सबसे दर्दनाक और शर्मनाक चेहरा तब सामने आया, जब दिव्यांग फल विक्रेता अजय के रोजगार पर प्रहार किया गया।
💡 ग्राउंड जीरो की बानगी:
• दिव्यांग अजय ने हाथ जोड़कर अधिकारियों से मांगी थी महज 5 मिनट की मोहलत
• अधिकारियों ने गुहार ठुकराई, अजय की आंखों के सामने उसकी तीन दुकानें जमींदोज
• विरोध करने वाले दुकानदारों के मोबाइल फोन भी छीनने का लगा गंभीर आरोप
• पीएम स्वनिधि लोन देकर आत्मनिर्भर बनाने वाला निगम ही अब बना बेरोजगार करने का जरिया
अजय ने बैसाखियों के सहारे खड़े होकर रोते हुए अधिकारियों और ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों से गिड़गिड़ाकर कहा था, “सर, मेरा पैर पहले से ही टूटा हुआ है। मैं भाग नहीं सकता। मुझे अपनी दुकान से सामान हटाने के लिए सिर्फ 5 मिनट का वक्त दे दीजिए।” लेकिन सत्ता और रसूख के नशे में चूर अधिकारियों के दिल नहीं पसीजे। अजय की चीखों को अनसुना कर उसकी आंखों के सामने उसकी तीनों दुकानों को मलबे के ढेर में बदल दिया गया। इतना ही नहीं, वहां मौजूद जिन अन्य दुकानदारों ने इस बर्बरता की तस्वीर अपने मोबाइल में कैद करने की कोशिश की, आरोप है कि पुलिस और निगम कर्मियों ने उनके मोबाइल फोन तक बलपूर्वक छीन लिए।
चुनिंदा कार्रवाई और खुले भेदभाव पर भड़के भाकपा नेता
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के प्रदेश सचिव कॉ. महेंद्र पाठक और जिला सचिव कॉ. अनिरुद्ध कुमार ने संयुक्त बयान जारी कर नगर निगम के इस विरोधाभासी और अमानवीय चेहरे को बेनकाब किया है। उन्होंने सीधे तौर पर नगर निगम पर ‘रसूखदारों को संरक्षण और गरीबों पर बुलडोजर’ चलाने का गंभीर आरोप लगाया है।
CPI नेताओं ने सवाल दागते हुए कहा:
“यह कैसी न्याय व्यवस्था है जहां सड़क से 10 से 12 फीट अंदर और अपनी सीमा में शांतिपूर्ण ढंग से फल-सब्जी बेचकर पेट पालने वाले गरीबों को जानबूझकर निशाना बनाया जा रहा है? इसी पीटीसी-मटवारी मार्ग पर बड़े-बड़े रसूखदार मॉल, विनायक होटल, फ्रंटियर होटल और नामचीन निजी शिक्षण संस्थान मौजूद हैं। इन बड़े प्रतिष्ठानों के बाहर मुख्य सड़क पर रोज गाड़ियों का लंबा और भारी जाम लगता है, जिससे पूरा शहर परेशान रहता है। लेकिन नगर निगम के बड़े अधिकारियों की आंखें इन रसूखदारों के सामने बंद हो जाती हैं। पीटीसी और मटवारी चौक के पास की चुनिंदा 12-13 रसूखदार दुकानों को छूने की हिम्मत निगम नहीं कर पाया, जबकि बीच के 25-30 गरीब दुकानदारों को पूरी तरह उजाड़ दिया गया। माननीय उच्च न्यायालय के आदेशों की आड़ लेकर सिर्फ कमजोरों को कुचला जा रहा है।”
“लोन देकर आत्मनिर्भर बनाया, अब दुकान तोड़कर किश्त मांग रहे हैं”
इस पूरे प्रकरण में नगर निगम की एक और बड़ी दोहरी नीति का पर्दाफाश हुआ है। पीड़ितों में से एक ने रोते हुए अपनी आपबीती सुनाई कि यह वही नगर निगम है जिसने कुछ महीने पहले केंद्र सरकार की ‘पीएम स्वनिधि योजना’ के तहत हमें आत्मनिर्भर बनाने के लिए खुद बैंकों से लोन दिलवाया था। आज उसी निगम ने हमारी दुकानें तोड़कर हमें पूरी तरह बेरोजगार और सड़क पर ला खड़ा किया है। अब हमारे पास न तो धंधा बचा है और न ही पैसे, लेकिन बैंक और निगम के अधिकारी हमसे लोन की मासिक किश्त (EMI) मांग रहे हैं। दुकानदारों की पुरजोर मांग है कि उन्हें उजाड़ने से पहले नगर निगम शहर में व्यवस्थित ‘वेंडिंग जोन’ चिह्नित करे और उनका उचित पुनर्वास सुनिश्चित करे।
जनप्रतिनिधियों की चुप्पी पर सवाल; सड़क से अदालत तक जंग की चेतावनी
भाकपा जिला सचिव कॉ. अनिरुद्ध कुमार ने हजारीबाग के वर्तमान राजनीतिक नेतृत्व पर भी तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि जब गरीबों के आशियाने और दुकानें उजाड़ी जा रही हैं, तब हजारीबाग के सांसद, स्थानीय विधायक और नगर निगम के जनप्रतिनिधियों ने रहस्यमयी चुप्पी साध रखी है। बड़े-बड़े पूंजीपतियों ने शहर की सरकारी जमीनों पर अवैध रूप से पक्के कब्जे जमा रखे हैं, लेकिन उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती।
भाकपा ने नगर निगम प्रशासन और जिला प्रशासन को अंतिम चेतावनी देते हुए कहा है कि अगर समय रहते निगम ने अपनी यह तानाशाही और मनमानी बंद नहीं की, पीड़ितों को उनके हुए लाखों के नुकसान का उचित मुआवजा नहीं दिया और उन्हें वैकल्पिक वेंडिंग जोन में पुनर्वासित नहीं किया गया, तो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी बाध्य होकर सड़कों पर उग्र जन आंदोलन करेगी और इस दमनकारी नीति के खिलाफ माननीय उच्च न्यायालय में कानूनी विधिक लड़ाई भी लड़ेगी।


