हजारीबाग: हजारीबाग के मुफस्सिल थाना क्षेत्र का गुड़वा मौजा इस वक्त एक बेहद संवेदनशील और बड़े जमीन विवाद का अखाड़ा बन चुका है। एक तरफ 1950 के दशक से स्थापित एक प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थान है, तो दूसरी तरफ अपने हक और अदालती दावों को लेकर लामबंद सैकड़ों ग्रामीण किसान हैं। विवादित भूखंड पर पक्की बाउंड्री वॉल के निर्माण और उसे बार-बार तोड़े जाने की घटनाओं के बाद क्षेत्र में भारी तनाव का माहौल है। मामले की गंभीरता को देखते हुए खुद सदर अंचल अधिकारी (CO) आशुतोष कुमार को पुलिस बल और अमीनों की टीम के साथ ग्राउंड जीरो पर उतरना पड़ा है।
“हमारे लेबर भगा दिए, गाली-गलौज की और बाउंड्री गिरा दी” — फादर जेम्स
संस्थान के मुख्य कर्ताधर्ता फादर जेम्स ने कैमरे के सामने अपनी पीड़ा और सुरक्षा संबंधी चिंताओं को प्रमुखता से रखा। उन्होंने कहा कि यह पूरी संपत्ति दशकों से संस्थान की ही है और सुरक्षा मानकों के तहत ही काम कराया जा रहा है।
फादर जेम्स ने अपना पक्ष रखते हुए कहा:
“यहाँ 1954 से मिडिल स्कूल और 1958 से टीचर ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट चल रहा है। लगभग 70 सालों से यह 30 एकड़ की पूरी जमीन हमारे अधीन है। पहले यहाँ सिर्फ तार का घेरा था, जिसे हम अब फंड मिलने पर पक्का कर रहे हैं क्योंकि इलाके में हाथियों का भारी आतंक है। लेकिन ग्रामीणों द्वारा हमारे काम का लगातार हिंसक विरोध किया जा रहा है। हमारे लेबरों को गाली देकर भगा दिया गया और कई बार पक्की बाउंड्री को ढहा दिया गया। हमारे पास रेवेन्यू डिपार्टमेंट, सीओ और थाने की पूरी रिपोर्ट है। जो लोग बाहर 24 एकड़ का दावा कर रहे हैं, वो जमीन कहाँ है, यह तो फारेस्ट डिपार्टमेंट ही बता सकता है; हमारे घेरे के अंदर वैसी कोई जमीन नहीं है।”
“100 बार आवेदन दिया पर सुनवाई नहीं हुई, हमारी पैतृक जमीन पर हो रहा कब्जा” — इदरीस अंसारी
दूसरी तरफ, ग्रामीणों की ओर से मोर्चा संभाल रहे सखिया गांव निवासी इदरीस अंसारी ने सिविल कोर्ट के पुराने फैसलों के दस्तावेज लहराते हुए संस्थान पर जबरन जमीन हड़पने का बेहद गंभीर आरोप लगाया।
इदरीस अंसारी ने आक्रोश व्यक्त करते हुए कहा:
“हम लोग 1938 से इस पैतृक जमीन पर काबिज हैं। सिविल कोर्ट के सेकंड एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज के टाइटल अपील नंबर 24/76 के जजमेंट के अनुसार यह 24 एकड़ 52 डिसमिल जमीन हमारे पूर्वजों को प्राप्त हुई है। वन विभाग ने भी 1965 के आदेश (ज्ञापांक 5227) के तहत इसे रिलीज किया था। जब संस्थान ने जबरन बाउंड्री शुरू की, तो हम 144 के तहत एसडीओ के पास गए। सीओ और वन विभाग के अमीन ने नापी करके बाउंड्री से आगे हमारी जमीन चिह्नित की थी, जहाँ हमने ट्रेंच (गड्ढा) खोदा था। लेकिन फादर जबरन उस पर भी दीवार खड़ी कर रहे हैं। हमने डीसी, एसपी, एसी और सीओ को 100 से ज्यादा आवेदन दिए, पर किसी ने सुध नहीं ली।”
294 एकड़ के इस महा-प्लॉट में कहाँ है ग्रामीणों की जमीन? सीओ आशुतोष कुमार की बड़ी जांच
इस पूरे हाई-वोल्टेज ड्रामे के बीच प्रशासन की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो गई है। मौके पर पहुंचे सदर सीओ आशुतोष कुमार ने मामले की पेचीदगियों को स्पष्ट करते हुए दोनों पक्षों से शांति बनाए रखने की अपील की है।
सदर सीओ आशुतोष कुमार ने बताया:
“यह पूरा मामला मौजा गुड़वा के खाता नंबर 2 और प्लॉट नंबर 632 से जुड़ा है। ग्रामीणों का कहना है कि उनकी साढ़े चौबीस एकड़ जमीन फॉरेस्ट विभाग द्वारा बहुत पहले रिलीज की गई थी, जिसका पेपर मैंने भी देखा है। लेकिन पेंच यह है कि इस पूरे प्लॉट का कुल रकबा 294 एकड़ का है। अब अमीन की टीम के माध्यम से हम यही तकनीकी जांच कर रहे हैं कि जिस जगह पर अभी बाउंड्री को लेकर विवाद हो रहा है, क्या वही असल में वह साढ़े चौबीस एकड़ की रिलीज भूमि है? जब तक पूरी पैमाइश और सरकारी जांच मुकम्मल नहीं हो जाती, तब तक ग्रामीणों और संस्थान दोनों से किसी भी प्रकार का नया निर्माण या तोड़-फोड़ (New Nuisance) न करने की हिदायत दी गई है।”
प्रशासनिक स्तर पर जांच शुरू होने के बाद फिलहाल निर्माण कार्य पर रोक लगा दी गई है, लेकिन 294 एकड़ के इस विशाल भूखंड के मालिकाना हक की यह लड़ाई आने वाले दिनों में हजारीबाग प्रशासन के लिए एक बड़ी कानून-व्यवस्था की परीक्षा साबित होने वाली है।


